बछ्वारस

Date: 4 Sep 2021

           भादव बदी बारस को ” बछ्वारस ” होती है । इस दिन एक पाटा पर माटी से बछ्वारस बनाओ । फिर इस पाटे पर जल, भैंस का दही, भिगोया हुआ मोठ – बाजरा, मोई (बाजरा के आटा में घी-चीनी पानी से ओसन कर), रोली, चावल, दूब, ठंडी रोटी और दक्षिणा चढ़ाओ । फिर कहानी सुनो । कहानी नीचे लिखी हुई है I

मोठ, बाजरा और रुपिया पर बाना निकालकर, सासुजी को पैर छुकर दे दो । अपनी बहन-बेटियों का भी बाना निकाल कर भेजो । इस दिन ठंडी रोटी खाओ । गाय का दूध-दही और गेहूँ-चावल नहीं खाते हैं । बछ्वारस की पूजा करने के बाद, अपने कुंवारे लड़के की नाभि पर साथिया बनाकर के दही, मोठ, बाजरा, दूब और एक रुपिया रखकर फुदकड़ा कर दो । बछ्वारस बेटा होने के बाद करते हैं ।

बछ्वारस का उजमन

जिस साल आपका लड़का होता है उसी साल बछ्वारस का उजमन करते हैं और पूजा जैसे हर साल करते हैं वैसे ही कर लेते हैं , सिर्फ एक थाली में भिगोया हुआ सवा सेर मोठ बाजरा की तेरह कुड्डी करो । दो-दो मुठिया मोई का (बाजरा के आटा में घी, चीनी, पानी से ओसन कर) और दो-दो पीस खीरा की तेरह कुड्डी पर रखो । ऊपर एक साड़ी और रुपिया रख कर, सासुजी को पैर छूकर दे दो । बाद में गीत गाते हुए जोड़ा पूजा जाता है । गठ जोड़ा की पूजा सब सामग्री से करो, फेरी दो और गीत गाते हुए वापस आ जाओ ।

बछ्वारस की कहानी

एक साहूकार था, जिक सात बेटा और भोत पोता था । साहूकार न एक जोहड़ो बनवायो थो । बनवायां बारा बरस होगा, तो भी ऊ म पानी कोणी भरयो । जद बो पण्डितां न बुला कर कारण पुछ्यो । पंडित बोल्या, कि या तो बड़ बेटा की या बड़ पोता की बलि दीयां तो जोहड़ो भरगो । जद साहूकार न आपनी बड़ी बहू न तो पीहर भेज देई और बड़ पोता की बलि दे दी । इतन म गाजती बरसती बादली आई और जोहड़ो भरगो । पिछ बछ्वारस आई जद सब कोई बोल्या, कि आपनो जोहड़ो भरगो, जिको पूजन चालो । जा व लागा जद आपकी दासी न बोलगा, कि गेहूँ ला न तो रांद लिए और धातुला न उछेड़ दिये । गेहूँ ला धानुला गाय क बाछा का नाम था, जिको बा उना न रांद दिया । बठी न साहूकार साहूकारनी गाजा-बाजा स जोहड़ो पूजयो । साहूकार क बड़ा बेटा की बहू भी पीहर स जोहड़ो पूजन आगी थी । जोहड़ो पूजन क बाद, जद टाबरां क फुदकड़ो कर न लाग्या, तो बलि देई जिको पोतो भी गोबर माटी म लिपटेड़ो जोहड़ो म स निकल कर बोल्यो, कि मेर भी फुदकड़ो करो । जद सास-बहू एक-दूसर क कोणी देख लागी । सासू, बहू न बलि देन की सारी बात बता दी और कयो कि बछ्वारस माता आपनो सत राख्यो है, जिको पोता न पाछो दे दिया । जोहड़ो पूज कर घरां आया और बछा न तो म रांद दिया । जद साहूकार बोल्यो कि पापनी एक पाप तो म्हे उतार कर आया हां, तू दूसरी और लगा दिया । साहूकार रांदेड़ा बाछा न मट्टी म गाड़ दिया और मुंद माथ पड़गा । संजता न गयां चार कर आई और आप क बांछ न कोणी देखकर जमीन खोदन लागी, तो बाछा माटी गोबर म लिपटेड़ा निकल आया । सब कोई साहूकार न बोल्या, कि तेरा बाछा आगा । साहूकार जाकर देख्यो तो बाछा दूध चूमता आ रया है । साहूकार गाँव म हेलो फिरा दियो, कि सब बेटा की मायां बछ्वारस करियो, जोहड़ो पूजियो । हे बछ्वारस माता ! जिसों बी साहूकार-साहूकारनी न दियो, बिसो म्हान भी दियो । कहतां न, सुणतां न, हुंकारा भरतां न, सब न देईयो ।

इसके बाद बिन्दायाकजी की कहानी सुनो ।

बिन्दायकजी की कहानी

विष्णु भगवान लक्ष्मीजी न ब्याहण जान लाग्या I जद सारा देवी – देवता न जनेत म लेजान बुलाया, जाण लाग्या तो सब कोई बोल्या, की गणेशजी न तो कोनी ले जाव क्यूँकी – सवा मण मूंग, सवा मण चावल, घी को तो कर कलेवो – जीमण फेर बुलाओ दुन्द दुन्दालो, सुन्ड सुन्डाला – उखला सा पाँव – छाजला स कान – मस्तक मोटो -लाजे भीमकुमारी, लाजे कुनणापुर की नारी I इन साग ले चाल क के करांगा, इन तो घर की रखवाली छोड़ जावांगा I पिछ सब कोई बारात में चल्या गया I बठी न नारदजी गणेशजी न बोल्या कि थारो तो भोत अपमान कर दियो, बारात बुरा लागती जिक स था न अठई छोड़गा I जद गणेशजी चूहा न आज्ञा देई, कि सारी धरती न थोथी कर दो I थोथी होन स बठी न भगवान का रथ का पहिया धरती म धसगा I सब कोई निकालन लाग्या, पर पहिया निकल्या कोनी I जद किसान खाती न बुलायो गयो I बो आकर पहिया क हाथ लगाकर बोल्यो – जय गणेशजी और रथ निकलगो I सब कोई पूछ्या कि गणेशजी न क्यूँ समयो I खाती बोल्यो – गणेशजी न सुमरे बिना कुछ भी काम कोनी सिद्ध होव I सब कोई सोच्या कि म्हे तो संदेही गणेशजी न छोड़ आया I पिछ सब कोई उनां न बुला क ले और पहले तो गणेशजी न रिद्धि -सिद्धि परणाई, पिछ विष्णु भगवान न लक्ष्मीजी परणाई I हे बिन्दायकजी महारज, जिसो भगवान को कारज सिद्ध कियो, बिसो सबको करियो I कहता न, सुनता न हुंकारा भरता न सबको करियो I म्हारा भी करियो I