बच्चे के जन्म के बाद की जाने वाली रस्मे (Jukebox)

लड़के का जन्म

जब माँ गर्भवती होती है तब तीसरे महीने से झालरा पहनती है I झालरा तब तक माँ पहनती है जबतक वह अपने बच्चे को दूध पिलाती है I बच्चा होने के बाद किसी किसी के यहाँ सतमासा और नौसेरी भी होती है I अपने रिवाज के अनुसार पूजा / रस्मे हो जाती है I किसी के घर में सतमासा बच्चा जब पेट में रहता है तब सातवे महीने पर होती है I

जब लड़का होता है तो थाल बजाया जाता है और दूध धुलाई का नेग होता है I दूध धुलाई का नेग लड़के की भुआ करती है I इसमें पानी में थोडा सा मूंग – चावल डालकर कंघी से 7 बार स्तन को छुआ देती है I फिर लड़के की भुआ को नेग दिया जाता है I उसके बाद जब माँ और बच्चे को घर लाते हैं तब उन्हें नहलाकर पुराना कपड़ा ही पहनाते हैं I फिर सूखे नारियल को पीसकर उसमे चीनी मिलाकर पहले उसको 7 जगह थोड़ा – थोड़ा निकालकर, उसे ब्राह्मणों को दे देते हैं और फिर माँ को खिलाया जाता है I उसके बाद पंडित से नहान को करने की कोई शुभ तारीख निकलवाई जाती है I

नहान के दिन माँ और बच्चे को उपटन लगाया जाता है I फिर उसके बाद पहले बच्चे को नहला देते हैं I उसके बाद माँ को नहलाते हैं I माँ को नहलाने से पहले उसके  सिर में सास झोल ( थोड़ा सा कच्चा दूध, मूंग, चावल, पैसा डालती है ) डालती है I उसके बाद माँ को नहला दिया जाता है I फिर माँ और बच्चे को पुराना कपड़ा पहना कर बेड पर लेटा दिया जाता है I 

इसके बाद पांएची की पूजा की जाती है I उसी समय देवर तनाव ( नारियल की रस्सी में एक ब्लाउज और सुपारी बांधकर उसे आँगन में क्रॉस स्टाइल में चारो कोने में बाँध दिया जाता है ) भी बांधता है I उसको नेग दिया जाता है I जिस कमरे में माँ और बच्चे रहते हैं उस कमरे के बाहर के दिवाल में ननद दिवाल के एक तरफ गोबर से साथिया और दूसरी तरफ गोबर से छाबड़ी बनाती है I फिर ननद साथिया और छाबड़ी पर हल्दी, रोली और मेहँदी लगा देती है I साथिया पर नाल की जोड़ी, सुपारी और चांदी का सिक्का चिपकाया जाता है I छाबड़ी पर नाल की जोड़ी और पैसा चिपकाया जाता है I फिर ननद को नेग (1 साड़ी और ओढ़ना या फिर 2 साड़ी ) दिया जाता है I फिर भाई बहन को साड़ी या ओढ़ना ( जो नेग में दिया गया है ) उढ़ा देता है I

पांएची की पूजा करते समय जिस कमरे में माँ और बच्चा हैं, उस कमरे की चौखट पर गोबर रखते हैं, उसे रोली और चावल से चिरचते हैं I फिर सरसों के तेल का दीपक जला देते हैं और हलवा चढ़ा देते हैं I फिर चौखट पे रोली से साथिया और छाबड़ी बनायी जाती है I फिर साथिया और छाबड़ी जो गोबर से बनी थी ( ऊपर देखें ), उसे बच्चे की माँ रोली – चावल से चिरचती है I मूंग और चावल से आखां डालती है I फिर ननद उसी दीये पे चांदी की कटोरी में काजल बनाकर भतीजे को लगाती है I फिर इस दीपक को ऐसी जगह रख दिया जाता है की बच्चा ना देख पाए I उसके बाद माँ को उठाकर कमरे में लेजाकर कुछ खाने को दे दिया जाता है I उस दिन रसोई में मूंग भात जरुर बनाया जाता है I माँ को भी मूंग – भात दिया जाता है I खाने खाने के बाद बच्चे की माँ की सिरगुत्थी ( सिर पे तेल लगाकर बाल बना देती है ) की जाती है I सिरगुत्थी ननद करती है I उसके बाद ननद अपनी भाभी को लाक का चूड़ा पहनाती है I फिर आधा सूखा नारियल में मेवा और रूपए डालकर भाभी ननद को देकर पैर छू लेती है I फिर बच्चे की माँ, बच्चे के झालरा और जामना ( जो उसके पीहर से आया है ) को चिरच देती है I फिर बच्चे को पहना देती है I उसके बाद माँ को तैयार करके सिर पे पोतड़ा ( मंडा हुआ जो पीहर से आया है ) लगा दिया जाता है I उसके हाथ में एक चांदी की लुटिया में एक छोटी सी लोहे की चाभी और जल डालकर उसके हाथ में पकड़ा देते हैं I फिर माँ को कूआं पूजन के लिए ले जाते हैं I कूआं पर रोली – चावल से साथिया और छाबड़ी बनती है I लाडू और पैसा चढ़ाया जाता है, भिगाया हूआ बाजरा चढ़ाया जाता है, मूंग चावल से आखां डाला जाता है, फिर कूएँ की 2 फेरी ली जाती है I फिर जितना सामान माँ ने चढ़ाया है, उसे कूएँ में डाल दिया जाता है I बाजरे का दाना बिलकुल भी बचना नहीं चाहिए I जो रूपए चढ़ाया था उसे ब्राह्मणी को दे देते हैं I जब कूआं पूज कर माँ आती है तब ननद लोग घर के दरवाजे को रोक कर नेग लेती है I फिर पगा लागनी होती है I इसमें ससुराल के सभी बड़ी महिलाओं को रूपए देकर पैर छूआ जाता है I

पगा लागनी करने के बाद खिचड़ी का नेग किया जाता है I इसमें सबसे पहले दो चोक ( पहले आटे से एक चौकोर बनाओ, फिर अंदर क्रॉस बनाओ और चारो कोने में कर्व बना दो ) पुराई जाती है I एक चोक के ऊपर पाटा रखो और दूसरे चोक के ऊपर चौकी रखो I पाटे के ऊपर बच्चे की माँ खड़ी होती है और चौकी के ऊपर माँ का भाई खड़ा होता है I पीहर के बाकी लोग भाई के बगल में खड़े हो जाते हैं I बहन भाई को टीका लगाती है I भाई बहन को पीला उढ़ाता है I फिर बहन अपने भाई का पीले के पल्ले से 2 बार सीना नापती है और अपने माथे लगाती जाती है I बहन भाई आपस में गले मिलते हैं I फिर माँ बाकी पीहर वालों को टीका लगा देती है I उसके बाद छात किया जाता है I ये रस्म कोई नौकर करता है I इसमें नौकर एक तौलिया या फिर एक रूमाल भाई के सिर के पास फैलाता है I माँ अपने सभी पीहर वालों का आरता (आरती) करके छात में रूपए डाल देती है I वह रूपए नौकर ही रख लेता है I आरता 4 बार किया जाता है I आरती की थाली में पीहर वाले रूपए डालते हैं I उसके बाद अपने सभी पीहर वालों को माँ पल्ला देती है I पल्ले में 1 मीठा, रूपए और एक सुखा नारियल आदमियों को देती हैं I 1 मीठा, रूपए और बेला ( आधा सुखा नारियल में मेवा भरकर ) सभी औरतों को देती है I दूसरे लड़के में खिचड़ी नहीं होती है I

 लड़के के होने पर किये जाने वाले उजमन

बासेड़ा का उजमन ( चैथ ), बच्छबारस का उजमन ( भाद्रव ), होई अष्टमी का उजमन ( कार्तिक ), माघ चौथ का उजमन ( माघ ) करते हैं I

लड़की के जन्म पर की जाने वाली रस्में

लड़की के जन्म पर ऊपर लिखी हुई सारी रस्में नहीं की जाती हैं I केवल पायंची पूजी जायेगी और पायेंची पूज कर पगा लागनी हो जायेगी I काजल घलेगा I घर में मूंग-भात बनेगा I उसके बाद माँ को उठाकर सिर्गुत्थी की जाती है, चूड़ा पहनाया जाता है I 

मुंडन

पहले, तीसरे या पांचवे साल में लड़के का मुंडन होता है I उसके बाद पगा लागनी होगी I किसी के यहाँ घर में हो जाता है, किसी के यहाँ राजस्थान जाकर अपनी कुलदेवी के स्थान पर होता है I  जैसी जिसके में मानता हो वैसे हो जाता है I बच्चे का बाल काट कर देवी को चढ़ा दिया जाता है I अगर लड़की होती है तब घर में देवी – देवता के सामने अच्छा दिन देखकर बाल उतरवा दिया जाता है I

परोजन

परोजन सबके घरों में नहीं होता है I कुछ लोग के घर में होता है और कुछ लोग के घर में नहीं होता है I परोजन लड़के होने पर ही किया जाता है I लड़की होने पर नहीं होता है I अगर किसी के सिर्फ लड़की ही होती है, बेटा नहीं होता है तब फिर बच्ची को अपने परिवार में अपनी चाची – ताई के साथ राजस्थान भेजकर बस उसका कान – नाक छिदवा दिया जाता है I परोजन इक्के ( जैसे तीसरे साल पे / पांचवे साल पे / 7 / 9 आदि ) पर ही होता है I 2 / 4 / 6 साल पे नहीं होता है I अगर किसी के पहली बेटी होती है और दूसरा बेटा होता है तब बेटे के साल के हिसाब से ही परोजन करते हैं, बेटी जितनी साल की है, उस हिसाब से नहीं I परोजन किसी के घर में होता है और किसी के राजस्थान (अपने कुल के स्थान पर ) में जाकर होता है I जब परोजन करना होता है तब सबसे पहले पंडितजी से पूछकर एक शुभ दिन निकलवाया जाता है I शुभ निकलने के बाद जिसके घर में होता है, वह अपने कुल पुरोहित जी से पूछकर परोजन विधिपूर्वक घर में कर लेता है I पुरोहित जी अपने साथ राजस्थान से कुल देवता की मूर्ति लेकर आते हैं और परोजन की विधि संपन्न कराते हैं I जिनके राजस्थान जाकर होता है, वह अपने पुरोहित जी को परोजन की शुभ दिन के बारे में बताते हैं I पुरोहित जी परोजन की सामग्री ( सामान ) बताते हैं I फिर लोग परोजन की तैयारी करके राजस्थान जाते हैं और पुरोहित जी से पूछकर विधिपूर्वक परोजन का काम संपन्न करते हैं I