दुबड़ी सात

Date: 13 Sep 2021

               भादव सुदी सात को ” दुबड़ी सात ” होती है । इस दिन ठंडी रोटी खाओ । एक पाटा पर माटी से दुबड़ी सात बनाकर जल, दूध, रोली, चावल, फूल, मोई (बाजरा के आटा में घी, चीनी, पानी से ओसन कर), भिगोया हुआ मोठ – बाजरा से पूजा करो I दक्षिणा चढ़ाओ । कहानी सुनो । कहानी नीचे लिखी हुई है I मोठ बाजरा, रुपिया रखकर बाना निकालो । बाजरा की मोई में एक कांटा रख कर खाओ । फिर बाना सासूजी को पैर छूकर दे दो । अपनी बहन-बेटियाँ का भी बाना निकालकर भेजो ।

दुबड़ी सात का उजमन

जिस साल लड़के की शादी होती है उस साल लड़की से दुबड़ी सात का उजमन कराते हैं । और बाकी सब ऊपर जैसा लिखा हुआ है वैसे ही करते हैं I सिर्फ बाने में एक थाली में तेरह कुड्डी भिगोया हुआ मोठ बाजरा की, एक साड़ी और रुपिया रखकर सासुजी को पैर छूकर दे दो ।

दुबड़ी सात की कहानी

एक साहूकार था, ऊँ क सात बेटा था । ब्याह होता ही बेटा मर जाता । छ बेटा अइयां ही मर गा । सातवाँ बेटा को पिछ डरता-डरता ब्याह मांड्यो । ब्याह म सब बहन-बेटियाँ न बुलाई । सब स बड़ी बुआ आन लागी, जद रास्ता म एक कुम्हार क ठहरी । कुम्हार तोय ढकनी गढ़ थो, जद वा पूछी कि तू के क रह । कुम्हार बोल्यो कि एक साहूकार है, जिक का छ बेटा तो मरगा, इब सातवाँ को ब्याह है, जिको भी ब्याह होता ही मर जासी । जद बुआ पूछी कि कैयां भी बच न सक है । के कुम्हार बोल्यो कि कोई दुबड़ी सात की पूजा कर, ठंडी खाव, कांटो फांस और बींद की बुआ ब्याह का सारा नेग उल्टा कर और गाली देती रह तो वो बच है । फेरा क बखत काव करुवा म काचो दूध और तां की फांस लेकर बैठ जाव आधा फेरा होव जद बींद न सांप डसन आवगो, जद सांप क आगे दूध को करुवो रख देव । सांप दूध पीन लाग, जद तांत स फांस लेव । पिछ सर्पणी बोली सांप न छुड़ान आवगी, तब उस स वचन ले लेव कि तू सातूं बेटा न छोड़गी जद ही मै सांप न छोडूंगी । पिछ बुआ आपन पीहर गई और गाली देती उतरी । सब कोई बोल्या कि म्हे तो काचो सूत लपेटों हां और तू आई जद स गाली देव है, पर वा कुछ बोली कोणी और सारा नेग उल्टा कराती गई । पिछ बारात जान लागी जद बुआ बोली कि म तो बारात पिछला दरवाजा स निकालूंगी । सब कोई भोत समझाया पर वा सुनी कोनी । बारात जैसे ही पिछला दरवाजा स निकल न लागी कि आगलो दरवाजो टूट कर गिरगो । सब कोई बुआजी की भोत बड़ाई कर न लाग्या । बारात जान लागी जद बुआजी गाली देती बकोली कि मैं भी बारात म जाऊंगी । परन्तु औरतें बारात म कोनी जाव, लेकिन वा जिद कर क साथ चली गई । रास्ता म बड़ को भोत बड़ो गाछ देख कर बारात गाछ क निच उतरन लागी, तो वा उतरन कोनी देई और गाली काढती बोली के बारात तावड़ा मउतारूंगी । सब कोई भोत समझाया, पर वा मानी कोनी । बारात जद तावड़ा म उतरी, तो बड को गाछ टूट क गिरगो । सब कोई बुआजी की भोत बड़ाई कर लाग्या । पिछ बारात जद पहुँच गी तो बुआजी बोलो कि म तो ढुकाव पिछला दरवाजा स ले जाऊँगी । जैयां ही ढुकाव पिछला दरवाजा स जान लाग्यो आगलो दरवाजो टूट क गिरो । पिछ बींद फेरा म बैठ लाग्यो, तो बुआजी गाली देती बोली कि म भी फेरा म बैठूंगी । सब कोई भोत समझायो पर वा मानी कोणी और काचो करवो दूध को और तांत की फांस ले कर बैठगी । आधा फेरा होगा जद सांप बींद न डस न आयो, तो बुआजी सांप क आगे करवो रखकर, सांप न फांस लियो । पिछ सांपनी, सांप न छुड़ान आई तो बुआजी न उस स वचन ले लियो कि मेरा छंऊ भतीजा को जीव दान दे और सातू भतीजा न बहुवाँ दे । सांपनी बोली कि तू मेर सांप न फांस लियो और मेर स वचन ले लियो, नहीं तो मैं छोड़ती कोनी । पिछ सांपनी छऊँ भतीजा न छोड़ दिया । सबन की बहुवा देई । सब को खूब धूम-धाम स ब्याह होयो । पिछ तो सब कोई बुआजी की भोत ही बड़ाई कर लाग्या । बारात पाछी आव लागी जद रास्ता म दुबड़ी सात आई, तो बुआजी बोली कि सब न दुबड़ी सात की कहानी सुनाऊंगी और पाटो पुजवाउंगी, पर तैयार कैयां करूँ । पिछ सब कोई उतरया, तो देख कि पाटो मंडेड़ो पड्यो है, भिजोणा का डल्ला षड्या है, पूजा की सामग्री पड़ी है, झाड़ी को गाछ उगर्या है । सब कोई बैठ ही बैठ कर दुबड़ी सात की पूजा करी, बाणा काड्या, कांटो फास्यो और कहानी सुनी । पिछ सब कोई आप क गाँव पाछा आगा । सब कोई साहूकार न जाकर बोल्या कि तेरा सातू बेटा बहुवाँ आव है । पिछ बेटा बहू सास-ससुरा क पगा पड़न लाग्या तो वे बोल्या कि ये सब बुआजी क पगा पड़ो, वा ही था न जिवा कर ल्याई है । पिछ सारी नगरी म हेलो फिरा दियो कि सब कोई दुबड़ी सात करियो, ठंडी खायो, बाणो निकालियो, कांटो फासियो । हे दुबड़ी माता ! जिसों बी साहूकार क बेटा-बहुवाँ क लिए क्यो बिसो सब क लिए करिये । कहतां न, सुणतां न, हुंकारा भरतां न, आपना सारा परिवार को करियो ।
इसके बाद बिन्दायकजी की कहानी सुनो ।

बिन्दायकजी की कहानी

एक ब्राह्मण थो जिको सुदियाँ उठ कर गंगाजी न्हातो और आकर बिन्दायकजी की पूजा करतो I बिकी लुगाई न पूजा करनी अच्छी कोनी लागती, वा रोज गुस्सो होती और कहती कि सबेर पहली पूजा करन बैठ जाओ हो, म झाड़ू – भारु और घर को काम कैयां करूँ I ब्राह्मण बिकी सुनतो कोनी I एक दिन ब्राह्मण तो गंगाजी न्हान गयो थो, पिछ स ब्राह्मणी बिन्दायकजी न छुपा दिया I ब्राह्मण आकर पुछ्यो कि मूर्ति कहाँ गयी I ब्राह्मणी बोली मन बेरो कोनी I ब्राह्मण रोटी – पानी कोनी खायो, कयो कि म तो पूजा कर क ही रोटी खाऊंगा I ब्राह्मणी भोत कयो कि खाल्यो, पर वो खायो कोनी और रोन लाग्यो I दोनुवां न रोता झगड़ता देख कर बिन्दायकजी की मूर्ति हंसन लागगी तो ब्राह्मणी गुस्सा म आकर बोली कि मूर्ति वा पड़ी I पिछ ब्राह्मण पूजा करयो I मूर्ति बोली कि मेरी सेवा करता तन भोत दिन होगा, कुछ मांग I ब्राह्मण बोल्यो कि अन्न मांगू धन मांगू जितना दुनियाँ म सुख है जिक सारा मांगू I बिन्दायकजी ब्राह्मण न सारा सुख, अन्न – धन दे दिया I ब्राह्मण मूर्ति न मंदिर म रखकर पूजा करन लाग्यो I ब्राह्मणी न इतनो अन्न – धन मिलन स, ऊन भी पूजा करन कि श्रद्धा जागगी और वा ब्राह्मण न बोलकर मूर्ति घर म लियाई और खूब प्रेम स पूजा करन लागगी I हे बिन्दायकजी महारज ! जिसो ब्राह्मण न सुख दियो बिसो सब न दियो I कहता न, सुनता न, हुंकारा भरतां न, आपना सारा परिवार न दियो I