सूरज महारज की कहानी
एक ब्राह्मण सूरज भगवान को भक्त थो । जिको न्हातो – धोतो, कथा – कहानी कहतो । घर म राहतो, तो ब्राह्मणी कहती कुमायां बिना कइयां सरसी । कुवां पर बैठ तो, परिहारी कोणी बैठ न देती । बाहर न जाकर बैठ तो, छोरा कोणी बैठ न देता । हाट प जाकर बैठ तो, हटूवा कोणी बैठ न देता । जद निराश होकर बावनी उजाड़ म जाकर बैठगो । बठ एक सुखो पीपल, सुखी सी तलाई थी । ब्राह्मण न्हायो – धोयो, पूजा – पाठ करी, कथा – कहानी कयी । कहताँ ही दूध स तलाब भर्गो, सूखी पीपल हरयो होगी और ऊँ म स सूरज नारायण बोलन लाग्या – ” म टू ठूँ तूं मांग ब्राह्मण म टू ठूँ, तू मांग ” । ब्राह्मण रोजिना पूजा कर तो पन या सुन – सुन कर सूख न पड़गो और सोचतो कि ऊर बावनी उजाड़ म भी कुन बोल है, कोई दिख भी कोनी । ब्राह्मण संजा होती तो घरां चल्यो जातो । एक दिन ब्राह्मणी पूछी कि ब्राह्मण देवता थे सूख न कैयां पड़गा । ब्राह्मण बोल्यो कि मेर दुःख को मतना पूछ । ब्राह्मणी कयो या तो बतानी ही पड़सी । म नहीं पूछूंगी तो कुन पूछ्सी । जद ब्राह्मण कयो कि घर म तो तू कोनी बैठ न देव कुवां पर पनिहारियाँ कोनी बैठ न देव । जद बावनी उजाड़ म जाकर बैठूं, न्हाऊं, पूजा करूँ, कहानी कहूँ । ऊठ एक सूखी पीपल और सूखी तलाई है, जिको तलाई तो दूध म स भर जाव, पीपला हरयो हो जाव । पाछो आन लागूं तो पीपल म स परचंदो बोल – ” म टू ठूँ तूं मांग ब्राह्मण म टू ठूँ, तू मांग ” । ऊठ भी कोनी टिक न देव । ब्राह्मणी बोली कि ब तो सूरज नारायण है । अब कि बोल तो सब कुछ मांग लियो । ब्राह्मण पूछ्यो कि के मांगू । ब्राह्मणी बोली कि अइयां मांग लियो -“अन्न देओ, धन देओ, लाछ देओ, लक्ष्मी देओ, दूध कड़ावण, पूत पाल न, सोना क अखार, सोना का बखार, मोतियां का थाल, मोटा रोटा, झाबर – झोला बेटा, लावणा आई लक्ष्मी, कुल आई बहू, हाथी – घोड़ा, लाव – लसकर नोखणी महल, चोरासी दिया, बारह बरस की सी मेरी काया, बारह बरस की सी मेरी ब्राह्मणी की काया ” । दूसर दिन सूरज भगवान ओजूं बोल्या । ब्राह्मण बइयां ही सब कुछ मांग लियो । सूरज भगवान बोल्या कि ब्राह्मण भोलो सो दिख थो, भोत ही मांग लियो, पर जा तेर इतनो ही हो जासी । घरां आयो, देख तो टूटी सी ठापरी थी वा भी कोनी, बुड्डी सी ब्राह्मणी थी वा भी कोनी । महलां म बाल – बाल मोती पोयां ब्राह्मणी खड़ी थी । ब्राह्मण न देखतां ही हेलो भय कि आ जावो यो आपनो ही घर है, सूरज भगवान टूठ्या है । ब्राह्मण इतनो धन देखकर बोल्यो कि इतनो धन को आपां के करांगा । ब्राह्मणी बोली कि धन को के कोनी होव, कुवारियाँ का ब्याह करांगा । ब्याहेड़ी का मुकलाव करांगा, यज्ञ करांगा, हेड़ा देवांगा । पिछ सब न जिमाया । पान देकर न्योतो दियो, फूल देकर बुलाया । सब ब्राह्मण न जिमाकर सोना क टक्का की, दक्षिणा देई । सब कोई राजा क बदल ब्राह्मण की जय बोलन लाग्या । कोई राजा न जाकर चुगली कर दी कि थारा बदल सब कोई ब्राह्मण की जय बोल है । राजा ब्राह्मण न बुलाकर पूछ्यो कि तेर इतनो धन कठ स होगो सो सब कोई तेर जय बोलन लाग्या । ब्राह्मण बोल्यो कि मन तो सूरज भगवान दियो है, सब ऊँना की ही जय बोल है । राजा पूछ्यो कि मेर धन तो है पर पुत्र कोनी सो मन के करनो चाहिए । ब्राह्मण बोल्यो थे थारा नगारा न उठा द्यो, सूरज भगवान न बैठा द्यो, थार पुत्र हो जासी । राजा बइयां ही कर्यो, सब कोई सूरज भगवान की जय बोलन लाग्या । राजा क नौवां महिना पुत्र होगो । राजा कयो ब्राह्मण न बुलाओ, ऊँ न ऊँचो बड्डो करांगा । ब्राह्मण आयो कयो कि मन के ऊँचो बड्डो करोगा । सूरज भगवान न करो । बो ही सबकी मनसा पूरी कर है, बिना न ध्यावो, मन इच्छा फल पावो । हे सूरज भगवान ! ब्राह्मण न राजा न दियो, जिसो सब न दियो । कहतां न, सुनतां न, हुन्कारां भरतां न आपना सारा परिवार न दियो ।