चौथ का व्रत

अगर किसी के घर में चौथ का व्रत करते हैं तो हर महिना की बदी की चौथ को व्रत करते हैं I व्रत – पूजा तो कार्तिक की चौथ की तरह ही करते हैं I सिर्फ बाना चीनी पर निकालते हैं I कहानी सुनते हैं 

   चौथ की कहानी

एक साहूकार क एक बेटा और एक बहू थी I बहू पीहर जाती जद ऊँ क बाप पूछ्तो कि के खाकर आई I वा बोलती बासी – कुसी खाकर आई हूँ I एक दिन साहूकार को बेटो, ससुरा स मिल न गयो I ससुरो बोल्यो कि थे मेरी बेटी न बासी – कुसी क्यूँ घाली हो I बेटा या बात माँ न आकर पूछ्यो, तो माँ बोली कि म तो ताज़ी घालूं हूँ, चाहे तू आज देख लिए I एक दिन बहू को बाप आयो, ओजू पूछ्यो कि बेटी के खायो I बेटी बोली बासी – कुसी खाई I बाप क जान क बाद धणी भोत नाराज होयो, बोल्यो कि मेर बाप न क्यूँ बदनाम कर है, ताज़ी खाकर बासी – कुसी बताव I जद वा बोली कि थे कुमाव ना थारो बाप कुमाव, जना बासी – कुसी होई की नहीं I या सुनकर ऊँकी धणी कुमान चल्यो  I एक दिन वा पड़ोसन क आगल ल्या न , देख तो सब कोई कहानी सुण है, जद पूछी कि यो के करो हो I पड़ोसन बोली कि म्हे चौथ की कहानी सुना हाँ I इस अन्न – धन्न होव, बेटा – पोता होव, बारह बरस को बिछड़ेड़ो धणी मिल जाव I जिक दिन स वा भी चौथ बरत कर न लागी I सासु चार बखत खाण न देती, जिको एक बार को हथकार निकालती, एकबार को गाय न देती, एकबार को राखुड़े गाड़ देती I और एक बार को चाँद न अरग देकर आप खा लेती I अइयां चौथ बरत करतां बारह बरस होगा I गणेश चौथ सोची कि इन बरत करतां बरस होगा, अगर ई क धणी न पाछो नहीं ल्यावांगा, तो आपां न कलयुग म कुन मानसी I ऊँ ही रात न चौथ माता ऊँ क धणी न बोली कि अब तू घरां चल्यो जा, तेरी औरत त न याद कर है I वो बोल्यो कि म तो भोत काम म उलझ रयो हूँ, कइयां जा न सकूँगा I चौथ माता बोली कि दिन उगन क पहले ही चौथ माता को नाम लेकर दोनूं गोडा मोड़ कर बैठ जाय, दनिया दे जासी, लेनिया ले जासी I वो सबेर उठ कर अइयां ही कर्यो I सारो काम पूरो होगो I घरां आन लाग्यो, तो रास्ता म एक बुड्ढो सांप दुःख क मारे जल न जाव थी, जिको बो ऊँन छिछकर्यो, अब म त न खाऊंगा I वो बोल्यो कि म बारह बरस स घरां जाऊं हूँ, जिको मेरी माँ लुगाई स मिल्या न दे, पिछ खा लिए I सांप बोल्या कि कैयां विशवास आव, तू तो छत पर जाकर पलंग पर सो जासी I बो बोल्यो सीढ़िया चढ़ कर आ जाय I इतनो कह कर उदास सो घरां आयो, कोई स बोल्यो भी कोणी I रात न छत पर सोन क लिए गयो और एक सीढ़ी म बालू, एक म दूध को कुन्डो, एक म पानी को कुन्डो और एक म फूल बखेर दिया I रात न सांप आयो, पहले तो बालू म खूब लोट – पालोटा खायो, पिछ सारो दूध – फाकी पीगो, फेर फलां की खूब सुगंध लेई और छत पर जान न लाग्यो, तो चौथ माता सोची कि आपां इको संकट नहीं टालांगा, तो कलयुग म कोई कोणी मानसी I ऊँन ढाल स ढक कर  तलवार स मार दियो, पर थोड़ी सी पूँछ कट कर ऊँकी जूती म गिरगी I पूंछ सोची कि यो जूती पैरसी जद खाऊंगा I कीड़ीयां आपस म बात करी कि ईकी लुगाई आप न रोजिना चून गेरती, सो ई क धणी की रक्षा करनी चाहिए I सगली कीड़ीयां लागकर पूंछ न थोथी कर दी, ऊँको संकट टलगो I सबेर उठन म देर होगी, तो माँ उठन जान लागी I सीढ़ी म खून देखकर चिल्लाई सोची कि मेरो बेटो मरगो I बेटो आकर सारी बात बताई और माँ न पूछ्यो कि मेर नाम स कोई पुण्य बरत करयो था के I माँ बोली म तो कुछ भी कोनी करी, पर लुगाई बोली कि म बारुं चौथ थार लिए करती I माँ बोली कि म तो त न बरत करतां देखि कोनी, चारुं बखत रोटी देती I बहू बोली कि म एक बार को हथकार निकालती, एकबार को गाय न देती, एकबार को राखुड़े गाड़ देती और एक बार को चाँद न अरग देकर खाती I ब्राह्मणी की छोरी न बुलाकर पूछ्यो, तो बोली कि हाँ देती I गाय न पूछ्यो, तो बा भी हुंकारो भर दियो I राखुड़ो खोद क देख तो सोना की जेट होगी I साड़ी नगरी म हेलो फिर दियो कि पुरुष की औरत, बेटा की माँ, दीदा – गोडा को धीरासी सब कोई बरत करियो I हे चौथ माता ! ऊँ न सुहाग दियो जिसो सब न दिए I कहताँ न, सुनतां न, हुन्कारां भरतां न, आपना सारा परिवार न सुहाग दिए I ईक बाद बिन्दायकजी की कहानी कहव I

बिन्दायकजी की कहानी

गणेशजी महाराज एक सेठजी क खेत म स निकल रहा था, तो बारा दाणा नाज का तोड़ लिया I पिछ गणेशजी क मन म विचार होगो कि म तो सेठजी की चोरी करली I गणेशजी, सेठजी क बारा बरस की नौकरी पर लाग्या I एक दिन सेठाणी निमट कर राख स हाथ धोन लागी, तो गणेशजी सेठाणी को हाथ मरोड़ क राख खोसली और माटी स हाथ धुआ दिया I सेठाणी सेठजी न बोली कि इसो के नौकर राख्यो है, जिको नौकर की जात होकर मेरी हाथ मरोड़ दिया I सेठजी गणेशिय न बुला क पूछ्या कि तू सेठाणी को हाथ क्यूँ मरोड्यो I जद वो बोल्यो कि म तो सीख की बात बताई हूँ, या राख स हाथ धोव थी, सो राख स भी कदे हाथ शुद्ध होया कर है के I राख स हाथ धोन स घर की रिद्धि – सिद्धि चली जाव, माटी स हाथ धों स आव I सेठजी सोच्या गणेशिय है तो स्यानो I थोड़ा दिन बाद कुम्भ के मेलो आयो, तो सेठजी बोल्या कि गणेशिया, सेठाणी न नुहाल्या I गणेशियो लेगो I सेठाणी किनार प बैठ क न्हान लागी, तो आगी न ले जाकर गोता खुवा ल्यायो I घरां आकर सेठाणी, सेठजी न बोली कि गणेशिया का ये के काम I मेरी इज्जत ले ली, इतना आदमियां बीच म मन आगी न घसीट कर नुहा – ल्यायो I गणेशिया न बुलाकर पूछ्यो, तो बोल्यो कि किनार बैठ कर छबलका कर थी, सब क न्हायेड़ा जल स न्हाव थी I आग न न्हान स अगल जनम म भोत बड़ो राजा और राजपाट मिलगो, जिक स नुहा ल्याहो I सेठजी सोच्या गणेशिय है तो स्यानो I एक दिन घर म हवन होव थी, सेठजी बोल्या कि गणेशिया सेठाणी न हवन म बैठ न बुलाल्या I सेठाणी न बुलान गयो I सेठाणी काली आंगी पहर क चालन लागी, तो आंगी फाड़ दी और बोल्यो कि लाल आंगी पहर क चाल I सेठाणी रूस क सोगी I सेठजी आकर पूछ्यो कि के बात है I सेठाणी बोली कि गणेशिया मेरी आंगी फाड़ दी I गणेशिया न बुलाकर बोल्या कि तू भोत बदमाशी कर न लाग्यो है I गणेशिया कयो कि सेठाणी काली आंगी पैर क जाव थी, म तो वा कढ़ा कर लाल आंगी पैर न बोल्यो I काली आंगी शुभ काम म पैर न स काम सफल कोनी होव I सेठजी सोच्या गणेशिय है तो स्यानो I एक दिन सेठजी पूजा कर न लाग्या, तो पंडित बोल्यो कि म्हे तो गणेशजी की मूर्ति ल्यानो भूलगा I गणेशिया बोल्या कि थे म न ही मूर्ति कर क विराजमान कर ल्यो I थारो सारो काम सफल हो जासी I या बात सुनकर सेठजी न भी गुस्सो आ गयो, बोल्यो कि अभी तक तो तू सेठाणी स मस्करी करी थी, अब मेर स भी कर न लाग्यो I गणेशजी बोल्या कि मस्करी कोनी करूँ, सच्ची बात कहूँ हूँ I इतनो कह क गणेशजी को रूप धर लियो I सेठ – सेठाणी सदा ही गणेशजी की पूजा करी I पूजा ख़तम होता ही गणेशजी अन्तरध्यान होगा I सेठ सेठाणी क भोत धोखो होयो कि आप न तो सदेही ही गणेशजी रहता, आप ऊँन स इतनो काम करायो I गणेशजी सपना म कयो कि म तो आपका खेत का बारा दान नाज का तोड़ लिया था, सो दोष उतार न खातर काम कर्यो थो I सेठजी क करोड़ों की माया होगी I हे गणेशजी महारज ! जिसो बी सेठ न दियो, बिसो सब न दियो I कहताँ न, सुनतां न, हुंकारा भरतां न आपना सारा परिवार न दियो I