प्रदोष बृहस्पतिवार कथा

शत्रु विनाशक भक्ति प्रिय , व्रत है यह अति श्रेष्ठ I

बार मास तिथि सब भी सग, यह व्रत अति जेष्ठ II

कथा इस प्रकार है कि एक बार इन्द्र और वृत्रासुर में घनघोर युद्ध हुआ I उस समय देवताओं ने दैत्य सेना पराजित कर नष्ट भ्रष्ट कर दी I अपना विनाश देख वृत्रासुर अत्यंत क्रोधित हो स्वयं युद्ध के लिए उद्यत हुआ I मायावी असुर ने आसुरी माया से भयंकर विकराल रूप धारण किया I उसके स्वरुप को देख इन्द्रादिक सब देवताओं ने इन्द्र के परामर्श से परम गुरु बृहस्पतिजी का आह्वान किया I गुरु तत्काल आकर कहने लगे – हे देवेन्द्र ! अब तुम वृत्रासुर की कथा ध्यानमग्न होकर सुनो – वृत्रासुर प्रथम बड़ा तपस्वी कर्मनिष्ठ था, इसने गन्धर्व पर्वत पर उग्र तप करके शिवजी को प्रसन्न किया था I पूर्व समय में यह चित्ररथ नाम का राजा था, तुम्हारे समीपस्थजो सुरम्य वन है वो इसी का राज्य था I अब साधू प्रवृत्ति विचारवान महात्मा उसमे आनंद लेते हैं I भगवान के दर्शन की अनुपम भूमि है, एक समय चित्ररथ स्वेच्छा से कैलाश पर्वत पे चला गया I भगवान का स्वरुप और वाम अंग में जगदम्बा विराजमान देख चित्ररथ हंसा और हाथ जोड़कर शिव से बोले – हे प्रभु ! हम माया मोहित हो विषयों में फंसे रहने के कारण स्त्रियों के वशीभूत रहते हैं I किन्तु देवलोक में ऐसा दृष्टिगोचर नहीं हुआ कि स्त्री आलिंगन सभा में बैठे I चित्ररथ के वचन सुनकर सर्वव्यापी भगवान शंकर हँसकर बोले कि हे राजन ! मेरा व्यवहारिक दृष्टीकोण पृथक है I मैंने मृत्युदाता काल कूट महाविष का पान किया है फिर भी तुम साधारण जनों के भांति मेरी हंसी उड़ाते हो I तभी पार्वती क्रोधित हो चित्ररथ कि ओर देखती हुई कहने लगी – ओ दुष्ट ! तूने सर्वव्यापी महेश्वर के साथ ही मेरी हंसी उड़ाई है, तुझे अपने कर्मो का फल भोगना पड़ेगा I

उपस्थित सभासद महान विशुद्ध प्रकृति के शास्त्र तत्वान्वेशी है, और सनक सनंदन सनत कुमार है, ये सर्वअज्ञान के नष्ट हो जाने पर शिव भक्ति से तत्पर है, अरे मूर्खराज ? तू अति चतुर है अतएव मैं तुझे शिक्षा दूँगी कि फिर तू ऐसे संतों के मजाक का दुस्साहस ही नहीं करेगा I अब तू दैत्य स्वरुप धारण कर विमान से नीचे गिर, तुझे मैं श्राप देती हूँ I अभी पृथ्वी पे चला जा I जब जगदम्बा भवानी ने चित्ररथ को ये श्राप दिया तो वो तत्काल विमान से गिरे, राक्षस योनी को प्राप्त हो गया और प्रख्यात महासुर नाम से प्रसिद्ध हुआ I त्वषठा नाम ऋषि ने उसे श्रेठ तप से उत्पन्न किया और अब वही वृत्रासुर शिव भक्ति में ब्रह्मचर्य दैत्य पर विजय प्राप्त कर सको गुरुदेव के वचनों को सुनकर सब देवता प्रसन्न हुए और गुरूवार त्रयोदशी प्रदोष व्रत विधि विधान से किया I राक्षस वृत्रासुर पर विजय प्राप्त कर इन्द्रदेव सुखपूर्वक रहने लगे I बोलो उमापति शंकर महादेव कि जय I