
होई अष्टमी
Date: 17 October 2022
होई का व्रत
कार्तिक बदी अष्टमी में ” होई का व्रत ” करते हैं I ये व्रत बेटा होने के बाद शुरू करते हैं I अगर किसी के घर में होई ( मांडते हैं ) बनाते हैं तो दिवाल पर चून लगाकर गेरू रंग से बना लेते हैं I शाम को होई के आगे पाटा पर जल का लोटा, सीरा, एक गिलास में गेहूँ, रोली और चावल रखो I एक चांदी की होई और दो मणियाँ नाल में पिरोकर रखो I फिर लोटा पर साथिया बनाओ और सात टिक्की दो I होई को रोली चावल से चिरचो और फिर सीरा से जिमाओ ( खिलाओ ) I सात दाना गेहूँ का हाथ में लेकर कहानी सुनो I कहानी नीचे लिखी है I फिर खुद को टीका लगाकर सीरा और रुपिया पर बाना निकालकर सासुजी को पैर छूकर दे दो I होई गले में पहन लो I गिलास का गेहूँ, थोड़ा सीरा और रुपिया ब्राह्मणी को दे दो I शाम को जब तारा निकले तब उसी जल के लोटे से और गेहूं के दाना से ( जिसे हाथ में लेकर कहानी सुनी है ) अरग दो I रोली चावल से चिरचो और सीरा चढ़ाओ I फिर खाना खा लो I दिवाली के बाद कोई अच्छा दिन देखकर होई निकाल दो I अपनी बहन बेटियों का भी बाना निकालकर भेजो I हर साल ऐसे ही होई बस नाल बदलकर पहनो I
होई का उजमन
अगर आपका बेटा होता है या फिर आपके बेटे की शादी होती है तब उस साल होई का उजमन करते हैं I जब खानी सुनो तब होई की कंठी में दो मणियाँ और डालो I एक थाली में सात जगह ४ – ४ पूड़ी, थोडा सीरा, साड़ी और रुपिया रखकर हाथ फेर कर सासुजी को पैर छूकर दे दो I सीरा – पूड़ी की कुड्डी का बाना बाँट दो I
होई की कहानी
एक साहूकार का सात बेटा, सात बहुवां और एक बेटी थी I एक दिन सातूं बहुवां और बेटी खंद माटी ल्या न गयी I माटी खोदन क समय, ननद क हाथ स स्याऊ का बच्चा मरगा I स्याऊ माता बोली कि अब म तेरी कूख बांधूंगी I ननद आपनी सारी भाभियाँ न कयो कि मेरी बदल कूख बंधवाल्यो I ६ भाभियाँ तो नटगी, पर छोटी भाभी थी जिकी सोची कि नहीं बंधवावांगा तो सासुजी नाराज हो जासी, सो वा न आपनी कूख बंधवाली I वा का टाबर होता और होई सात क दिन मर जाता I एक दिन वा पंडितां न बुलाकर पुछ्यो कि यो के दोष है, मेर टाबर होता ही मरजावां I पण्डित बोल्या कि तू सुरही गाय की सेवा किया कर, बा स्याऊ माता की भायली है, जिको तेरी कूख छुड़वा देगी, जद ही तेरा टाबर जीसी I बा खूब सुदियाँ उठकर सुरही गाय को सारो काम कर क आ जाती I एक दिन गऊ माता सोची कि आजकल कुण मेरो इतनो काम कर है, बहुवां तो लड़ाई करती रहती I आज देखनो चाहिए कि कुन सी काम कर है, गऊ माता खूब सुदियाँ उठ कर बैठ गी, देखा तो साहूकार क बेटा की बहू सारो काम कर है I बा बोली की म न बाचा दे, गऊ माता ऊन बाचा दे दिया I बहू बोली कि स्याऊ माता क न मेरी कूख बंधरी है, बा थारी भायली है, सो मेरी कूख छुड़वा देओ I जना गऊ माता बी न सात समुन्दर पार अपनी भायली क पास ले जान लागी I रास्ता म धूप थी, सो ब लोग एक पेड़ क निच बैठगा I थोड़ी देर म एक सांप आयो I बा पेड़ पर गरुड़ – पंखनी का बच्चा था, जिका न डस न लाग्यो I साहूकार क बहू देख ली और सांप न मारकर ढाल न नीच रख दियो I गरुड़ – पंखनी आई और आकर साहूकार की बहू क चोंच मारन लागी I बा बोली कि म तेर बच्चा न कोणी मार्यो, यो सांप मार्यो थो, म तो जिवाया हूँ I गरुड़ – पंखनी बोली कि तू मेरा बच्चा न बचाया है, सो कुछ मांग I बा बोली कि सात समुन्दर पार स्याऊ माता रहत है, म्हा न ऊँ क पास पहुँचा दे I गरुड़ – पंखनी आपनी पीठ पर बैठा कर दोनुवां न स्याऊ माता क पास पहुंचा दी गरुड़ – पंखनी स्याऊ माता गऊ माता न बोली कि आव भैण भोत दिन स आई, मेरा सिर म जूं पड़गी, सो काढ़ दे I गऊ माता बोली कि मेर साग आई है, जिकी स कढ़ा ले I साहूकार की बहू बिकी जूं काढ़ दी I स्याऊ माता बोली कि तू मेर भोत सलाई गेरी, सो तेर सात बेटा सात बहुवां होव I जना बा बोली कि मेर तो एक भी कोणी, सात क स होसी I स्याऊ माता पूछी कि क्यूँ कोणी होया I बा बोली बाचा दे जद बताऊंगी I सयाऊ माता बोली कि बाचा सो बाचा ऊँकू तो धोबो कुंड पर कांकरी होऊं I साहूकार की बहू बोली कि मेरी कूख तो थार पास ही बंधी पड़ी है I सयाऊ माता बोली कि तू तो मन भोत ठगली, म तेरी कूख खोलती तो कोणी, पर अब तो खोलनी पड़सी I तेरा घरां जा, त न सात बेटा, सात बहुवां मिलसी I तू सात उजमन करिए, सात होई मांडिये, सात कढ़ाई करिए I बा घरां जाकर देख तो सात बेटा, सात बहुवां बैठी हैं I जनां बा सात होई मंडाई I कोई दीवाल क, कोई मटका, कोई कठ I सात उजमन करिया, सात कढ़ाई करी I ऊँ की सब देवर जिठानियां बोली कि जल्दी – जल्दी धोका – पूजा करलो, नहीं तो सद – रोई रोन लाग जासी I थोड़ी देर म वा आपका टाबरां न देखन भेजी कि आज सदरोई, रोई कैयां कोणी I टाबर आकर बोल्या कि माँ आज तो चाची के होई मंडरी है, खूब उजमन होरया है I जद डोर – जिठानियां दौड़ी – दौड़ी गयी, देख तो बा आपकी कूख छुड़ा ल्याई और ऊँ न पूछन लाग गी कि कैयां छुड़ाई जद बा बोली कि ये तो कूख बंधाई कोनी थी, म टाबर थी सो बंधवा ली, पर सयाऊ माता दया कर क मेरी कूख खोल दी I हे सयाऊ माता ! जैयाँ बी साहूकार की बहू की कूख खोली बैयाँ म्हारी भी खोलिए I कहताँ की, सुणतां की सब की खोलिए I ईक बाद बिन्दायकजी की कहनी सुनो I
बिन्दायकजी की कहनी
एक बिन्दायकजी महाराज थे, जिको चुटकी म चावल और चमची म दूध लेकर घूमा कि कोई खीर कर दो I जना एक बुढ़िया माई बोली कि ल्या म कर दूं I एक कटोरी ल्याई, तो बिन्दायकजी बोल्या कि बुढ़िया माई कटोरी के ल्याई, टोप चढ़ा I बुढ़िया माई बोली कि इतना बड़ा म के करगो, या कटोरी ही भोत है I बिन्दायकजी बोल्या की तू चढ़ा कर देख I बुढ़िया माई ने टोप चढ़ा दियो, चढातां ही टोप दूध स भरगो I बिन्दायकजी महाराज बोल्या कि म बहार न जाकर आऊं हूँ, तू खीर बनाकर राखिये I खीर बन कर तैयार होगी I बिन्दायकजी आयो कोणी, तो बुढ़िया माई को मन चालगो I बा दरवाजा क पिछ बैठकर खीर खावन लागगी और बोली कि जय बिन्दायकजी महारज ! भोग लगा ल्यो I इतना म बिन्दायकजी आया और बोल्या कि खीर करली के I बुढ़िया माई बोली कि हाँ करली, आओ जीम I जद बिन्दायकजी बोल्या कि म तो जीम ल्यो, जद तू भोग लगाईं I बुढ़िया माई बोली कि हे महाराज , मेरा तो परदा फास कर दिया लेकिन और कोई क मत करियो I बिन्दायकजी महारज न बुढ़िया माई क धन क अटूट भंडार कर दिया और बोल्या कि म तेर सात पीढ़ी ताई कोणी नीमढू I हे बिन्दायकजी महारज ! जिसो बुढ़िया माई न दियो, बिसो सब न दियो I कहताँ न, सुणतां न, हुंकारा भरतां न, आपना सारा परिवार न दियो I