आंवला नवमी

Date: 02 November 2022

               कार्तिक सुदी नवमी को ” आंवला नवमी ” आती है । इस दिन आंवला के पेड़ की पूजा करो । जल, रोली, मोली, चावल, गुड़, मीठी सुहाली, बताशा, आंवला, ब्लाउज और दक्षिणा चढ़ाओ । धुप-दीप करो । एक-सौ-आठ या आठ फेरी दो । कहानी सुनो । आंवला के नीचे ब्राह्मण-ब्राह्मणी को जोड़े से भोजन कराओ । आंवला जरूर दो । खाना खिलाकर साड़ी, ब्लाउज और दक्षिणा दो । इस दिन आंवला जरूर खाना चाहिए । इस दिन ” नारायणी जयंती ” भी होती है I 

आंवला नवमी की कहानी

एक आंवलियो राजा थो, जिको रोजीना सोना का सवा मन आंवला दानकर क जीमतो । एक दिन ऊँका बेटा-बहू सोच्या कि अगर यो इतना आंवला रोजिना दान करगो, तो सारो धन खत्म हो जासी । बेटो, बाप क न गयो और बोल्यो कि थे अइयां तो सारो धन लुटा देवोगा, सो अब आंवला दान कोनी कर न सको । राजा-रानी दुःख क मारे बावनी उजाड़ म जाकर बैठगा । ऊँना न भूखा-प्यासा बैठ्या सात दिन होगा । राजा आंवला दान कर न सक्यो, कोनी और दान कर बिना खायो कोनी । जद भगवान सोच्यो कि अगर अब म इना को सत नही राखूंगा तो आपां न दुनिया म कोई मानसी कोनी ।भगवान राजा न सपना म बोल्या कि तू उठ और देख, तेर पहले क जैसा ही राज-पाट हो रया है, आंवला का गाछ उग रया है । उठ कर आंवला दान कर और जिम । राजा-रानी उठ कर देख्या, तो पहले स भी बेसी राज-पाट, सोना का आंवला हो रया था । वा लोग फेर रोजीना सवा मन आंवला दान करन लाग्या । खूब सुख सरब लग्या । बठी न बेटा-बहू क अन्नदाता बैर पड़गो । आस-पास का लोग बोल्या कि जंगल म एक आंवलियो राजा रव है, थे बठ चल्या जावो, बो थारा दुःख दूर कर देसी । बी लोग बठ पहुंचा, तो रानी बिना न ऊपर स देख लिया और आपना आदमियां न बोल्या कि इना न काम पर राख ल्यो । काम तो कमती करायो, मजूरी ज्यादा दियो । एक दिन रानी आपकी बहू क बुलाकर बोली कि मेरो सिर नहलादे । बहू सिर नहलान लागी, तो बहू क आँख म स आंसू रानी क पीठ पर गिरगो । रानी पूछी कि तू रोव कैयां लगी है, जिसी बात बता । बहू बोली कि मेरी सासु की पीठ प भी इसो ही मस्सो थो, वा भी सवा मन आंवला रोजिना दान करती । म्हे बिना न आंवला कोनी दान कर न दिया और घर स निकाल दिया । जद सासु बोली कि म्हे ही तेरा सासु-सुसरा हां, थे तो म्हान निकाल दिया, लेकिन भगवान म्हारो सत राख्यो । हे भगवान ! जिसो राजा-रानी को सत राख्यो, जिसो सबको राखियो । कहतां न, सुणतां न, हुंकारा भरतां न, आपका सारा परिवार को राखिये । इसके बाद बिन्दायाकजी की कहानी पढ़ो ।

बिन्दायाकजी की कहानी

एक छोटो सो छोरो आपकां घरां से लड़ कर निकलगो और बोल्यो कि आज तो बिन्दायकजी स मिलकर ही घरां पाछो जाऊँगा । छोरो जातो – जातो बावनी – उजाड़ म चल्यो गयो । बिन्दायकजी सोच्या कि यो मेर नाम से घर स  निकल्यो है, सो ई न घरां पाछो नहीं भेजांगा, तो बाघ – बघेरा खा जासी । बिन्दायकजी बोल्या कि म ही बिन्दायाकजी हूँ, त न के चाहे है, सो मांग ले, पर एक ही बार में माँगिये । छोरो बोल्यो कि – काई मांगू बापूजी – ढोलो हिंगराजको – पूछो गजराजको – दाल, भात, गीवाँ का फलका – ऊपर ढबसो खांड़ को – परोसन वाली इसी मांगू – जा न फूल गुलाब की । बिन्दायकजी बोल्या कि छोरा तू तो सब ह मांग लियो पण जा अइयां ही हो जासी । छोरो घरां म आयो देख, तो एक छोटी सी बीननी पीड़ा पर बैठी है और घर म भोत धन हो रयो है । छोरो आपकी माँ न बोल्यो कि माँ देख म बिन्दायकजी स मांग क कितनो धन लायो हूँ । माँ खूब राजी होगी । हे बिन्दायकजी महारज ! जिसो बी छोरा न धन दियो, उसो सब न दियो । कहतां न, सुणतां न, आपना सारा परिवार न देइयो ।