चाणन छट

Date: 28 August 2021

  भादव बदी छट को ” चाणन छट ” होती है । इस दिन कुंवारी लड़कियाँ व्रत करती हैं । एक पाटा पर जल का लोटा, एक गिलास में गेहूँ और दक्षिणा रखो । लोटा पर रोली से साथिया करो, ऊपर सात टिक्की दो । हाथ में सात दाना गेहूँ से और लोटा के जल से, रात में चाँद उगने के बाद अरग दो । एक जल की लुटिया भी कहानी सुनती समय रखो जिसे अरग देने के बाद पी लो । कहानी नीचे लिखी हुई है I

चाणन छट का उजमन

लड़की ब्याह्वली साल ” चाणन छट ” का उजमन करती है । अपने साथ सात लड़कियों को भी व्रत कराते हैं । सब कुछ हर साल की तरह ही करते हैं, सिर्फ कहानी सुनने के बाद एक थाली में सात जगह चार-चार पूड़ी, सीरा, एक साड़ी – रुपिया रख कर बाना निकालकर सासूजी को पैर छूकर दे दो I जब भोजन करो तो एक लड़के को भी साथ खिलाना चाहिए । अगर ब्राह्मण की लड़कियाँ हो तो दक्षिणा भी दो ।

चाणन छट की कहानी

एक साहूकार एक साहूकारनी थी । साहूकारनी अलग होयेड़ी बर्तन-भांडा सब छूती । थोडा दिन बाद दोनूं जना मर गा । दूसर जनम म साहूकार न तो बैल की जूणी और साहूकारनी न कुतिया की जूणी मिली । दोनूं जना आपन लड़का क घरा ही रहता । बैल तो दिन भर खेत म काम करतो और कुतिया घर की रखवाली करती । एक दिन लड़का क बाप को – बैल को श्राद्ध आयो । बहू न खीर की रसोई बनायीं थी । एक चील आकर मरेड़ा सांप न खीर क टोपिया म गेरगी । कुतिया बैठी बैठी सब देखली और सोची कि अब तो ब्राह्मण इ न खावगा तो मर जासी । बहू कमरा म आई । जद ऊन दिखाकर खीर म मूंह दियो । या देखकर बहू गुस्सा म आकर कुतिया न जलती लकड़ी स मारी और कुछ खान भी कोणी दियो । बाद म दूसरी खीर बनाकर ब्राह्मण न जिमाया । रात न बैल और कुतिया आपस म बात कर लाग्या । कुतिया बोली – एक चील सांप न खीर म गेरगी थी, बहू देखि कोणी, सो म उन दिखाकर खीर झूठी कर दी । बहु गुस्सा म आकर मन भोत मारी और खाना भी कोणी देई । थारी तो आज श्राद्ध थी, जिको था न तो खाना मिल्गो होसी । जद बैल बोल्यो कि मन भी आज कुछ खा न कोणी दियो और काम भी भोत करायो । उठोन बेटा-बहू उनाकी बात सुन ली और उना न पेट भर क खुवायो । दूसर दिन पण्डित बुलाकर पूछो की मेरा माँ बाप के जूणी म है । जद पंडित न बताया कि बैल की जूणी म बाप है और कुतिया की जूणी म माँ है । जद पंडित लोग बोल्यो की भादुवा बदी छट न लड़कियाँ व्रत कर क, कहानी सुनकर रात न अरग देव है । जब अरग देसी तब इना न ऊंक निब खड्यो कर दियो, जिक स इना की या जूणी छूट जासी । तेरी माँ अलग होवेड़ी सब कुछ छूती जिक स वा जूणी मिली है । पिछ लड़को उना न, लड़कियाँ अरग दुई ऊंक नीच खड्यो कर दियो । ऊना की जूणी छूट गी, मोक्ष होगी । हे चना छट माई ! ऊना की मोक्ष करी जिसी म्हारी भी करिए I कहत, सुनत, हुंकारा भरत की सब की करिए ।

इसके बाद बिन्दायाकजी की कहानी सुनो ।

बिन्दायकजी की कहानी

विष्णु भगवान लक्ष्मीजी न ब्याहण जान लाग्या I जद सारा देवी – देवता न जनेत म लेजान बुलाया, जाण लाग्या तो सब कोई बोल्या, की गणेशजी न तो कोनी ले जाव क्यूँकी – सवा मण मूंग, सवा मण चावल, घी को तो कर कलेवो – जीमण फेर बुलाओ दुन्द दुन्दालो, सुन्ड सुन्डाला – उखला सा पाँव – छाजला स कान – मस्तक मोटो -लाजे भीमकुमारी, लाजे कुनणापुर की नारी I इन साग ले चाल क के करांगा, इन तो घर की रखवाली छोड़ जावांगा I पिछ सब कोई बारात में चल्या गया I बठी न नारदजी गणेशजी न बोल्या कि थारो तो भोत अपमान कर दियो, बारात बुरा लागती जिक स था न अठई छोड़गा I जद गणेशजी चूहा न आज्ञा देई, कि सारी धरती न थोथी कर दो I थोथी होन स बठी न भगवान का रथ का पहिया धरती म धसगा I सब कोई निकालन लाग्या, पर पहिया निकल्या कोनी I जद किसान खाती न बुलायो गयो I बो आकर पहिया क हाथ लगाकर बोल्यो – जय गणेशजी और रथ निकलगो I सब कोई पूछ्या कि गणेशजी न क्यूँ समयो I खाती बोल्यो – गणेशजी न सुमरे बिना कुछ भी काम कोनी सिद्ध होव I सब कोई सोच्या कि म्हे तो संदेही गणेशजी न छोड़ आया I पिछ सब कोई उनां न बुला क ले और पहले तो गणेशजी न रिद्धि -सिद्धि परणाई, पिछ विष्णु भगवान न लक्ष्मीजी परणाई I हे बिन्दायकजी महारज, जिसो भगवान को कारज सिद्ध कियो, बिसो सबको करियो I कहता न, सुनता न हुंकारा भरता न सबको करियो I म्हारा भी करियो I