
करवा चौथ
Date: 14 October 2022
पूजा की विधि
कार्तिक बदी चौथ को ” करवा चौथ ” का व्रत करते हैं I इस दिन पाटा पर जल का लोटा, बाना निकालने के लिए मट्टी के करवे में गेहूँ और ढक्कन में चीनी -रुपिया, रोली, चावल, गुड़ और एक गिलास में गेहूँ रखो I फिर लोटा और करवे में साथिया बनाओ और तेरह टिक्की दो I तेरह दाना गेहूं का हाथ में लेकर कहानी सुनो I कहानी नीचे लिखी हुई है उसके बाद खुद को टीका लगाकर, बाना निकालकर सासुजी को पैर छूकर दे दो I गिलास का गेहूं और रुपिया ब्राह्मणी को दे दो I रात को जब चाँद निकले तब उसी जल के लोटे ( जिससे पूजा की है ) से और तेरह दाना गेहूं से ( जिसे लेकर कहानी सुनी है ) अरग दो I रोली, चावल, और गुड़ चढ़ाओ I फिर खाना खा लो I अपनी बहन – बेटियों का भी बाना निकालकर करवा और रुपिया भेजो I
चौथ का उजमन
जब चौथ का उजमन करते हैं तब तेरह सुहागन ब्राह्मणियों को भोजन कराते हैं I जब कहानी सुनो तब तेरह जगह 4 – 4 पूड़ी, थोड़ा – थोड़ा सीरा, साड़ी और रुपिया पर भी बाना निकालकर सासुजी को पैर छूकर दो I रात में जब ब्राह्मनियां खाती है, तब तेरह सीरा – पूड़ी की कुड्डी भी उनको दे दो I उन्हें खाना खिलाकर, टीका लगाकर रुपिया दो I फिर आप खाना खा लो I
करवा चौथ की कहानी
एक साहूकार क सात बेटा एक बेटी थी I सातूं भाई, बहन न साथ लेकर जीमता I कार्तिक लागत की चौथ आई, भाई आपकी बहन न बोल्या कि आव बाई जीम I बहन बोली कि आज तो मेर करवा चौथ को बरत है, सो चाँद उगन स जीमूंगी I भाई सोच्या कि बहन भूखी रवगी, सो एक भाई दीवो लिए, एक भाई चालनी लेकर टीबाक ओल होकर, दीयो चास कर चालनी ढक दी और कयो कि बहन चाँद उग आयो है, अरग दे ले I बहन भाभियाँ न आकर बोली कि आवो अरग देवां I भाभियाँ बोली कि बाई जी थारो चाँद उग्यो है, म्हारो तो रात न उगसी I बहन अकेली ही अरग देकर भायां क साथ जीमण बैठगी I पहल गासिया म बाल आयो और तीसरा म बाई न सासर लोग लेण आगा कि बाई को पावनो भोत बीमार है, सो जल्दी भेजो I माँ बाई न पैरन खातर तीन बार बुगच्यो खोल्यो, तीनू बार ढोलो भातो निकल्यो I बाई न जद धोलो ही पहना कर सासर भेज दियो I माँ एक सोना को टक्को पल्ला क बाँध दियो और बोली कि रास्ता म कोई भी मिल ऊँक पगा लागती जाय और जिकी तन सुहाग की आशीष देव, ऊँ न सोनो को टक्को देकर पल्ला क गाँठ लगा लिये I रास्ता म सब जणी भायां का सुख देख की आशीष देती गयी, कोई भी सुहाग की आशीष कोणी देई I सासरा का दरवाजा पर छोटी सी ननद कड़ी थी, बा ऊँक पगां लागी तो बोल कि सील सपूती हो, सात पूत की माँ हो, मेरा भाई का सुख देख I सोना को टक्को ननद न देकर पल्ला क गाँठ बाँधली I भीतर गयी तो सासू पीडो कोणी घाली, बोली कि ऊपर मरेड़ो पड्यो है, बठ जाकर बैठ जा I ऊपर गयी देख तो धणी मर्यो पड्यो है, उक कन बैठ गी और ऊँन सेवन लागगी I बिकी सासु रोजिना बची – कुची रोटी दासी न देकर भेजती और कहती – मर्यो सेवड़ी न रोटी दी आ I थोड़ा दिन बाद मंगसिर की चौथ आई और बिन बोली – करवो ले करवो ले I जद बा बोली कि हे चौथ माता ! या उजड़ी तो थे ही सुधारगा, म न तो सुहाग देनो पड़सी I चौथ माता बोली कि पोह की चौथ आवगी, बा मेर स बड़ी है I ई तरियां सारा महिना की चौथ आती गयी, सब अइयां ही कहती गयी कि मेर स बड़ी चौथ आवगी, बा तन सुहाग देसी I पिछ आस्योज की चौथ आई और उन बोली कि कार्तिक की चौथ तेर पर नाराज है, तू ऊँका पग पकड़ लिए, बा ही तन सुहाग देसी I पिछ कार्तिक की चौथ आई और गुस्सा म बोली कि – भायां की प्यारी करवो ले – दिन म चाँद उगानी करवो ले – धणी भूखाणी करवो ले – व्रत भांडणी करवो ले I जद साहूकार की बेटी बिका पग पकड़ लिया, रोन लागी और बोली कि हे चौथ माता ! मेरो सुहाग तो थार हाथ म है, थान देनो पड़सी I चौथ माता बोली कि पापिनी – हत्यारिनी मेरा पग क्यूँ पकड़ कर बैठी है I बा बोली कि मेरी बिगड़ी अब थान ही सुधारनो पड़सी I म न तो सुहाड़ देनो पड़सी I चौथ माता राजी होगी और आँख म स काजल काड्यो, नुवम स मेहँदी काड़ी, टिका म स रोली काड़ क चीटली आंगली को छांटो दियो I देता ही उको धणी उठ कर बैठगो और बोल्यो की भोत सुत्यो I बा बोली कि क्यां का सुत्या, म न तो बारा महिना होगा सेवतां, चौथ माता सुहाग दियो है I धणी बोल्यो कि चौथ माता को उछाव करां I जद बा चौथ माता की कहानी सुणी, करवो मिन्स्यो, चूरमो बनायो I दोनूं जणा जीमकर चोपड़ – पासा खेल न लाग्या I नीच स ऊँकी सासू दासी क हाथ रोटी भेजी I दासी चोपड़ – पासा खेलता देख सासू न आकर बोली कि बी तो दोनूं जणा चोपड़ – पासा खेल है I सासू ऊपर आई, देख कर भोत खुश हुई और पूछी कि यो सब कैयां होगो I बहू बोली कि म न तो चौथ माता सुहाग टूठी है और सासू क गला लागली I सासू सुहाग की भोत आशीष देई I सारी नगरी म हेलो फिरा दियो कि पुरुष की लुगाई, बेटा की माँ सब कोई चौथ चौथ का व्रत करियो I तेरह चौथ करियो I हे चौथ माता ! जिसो साहूकार की बेटी न सुहाग दियो बीसो सब न दियो I कहताँ न, सुनता न, हुंकार भरतां न, आपना सारा परिवार न दियो I ईक बाद बिन्दायकजी की कहानी सुण I
बिन्दायकजी की कहानी
एक अंधी बुढ़िया माई क एक बेटो और ऊँ बेटा की बहू थी I बी लोग भोत गरीब थे I बुढ़िया माई रोजीना गणेशजी की पूजा करती I गणेशजी रोजीना कहता कि बुढ़िया माई कुछ मांग I बुढ़िया माई कहती म न तो माँगनो कोणी आव I गणेशजी बोलता अपना बेटा – बहू न पूछले I जद बा आपना बेटा स पूछी, तो बेटो बोल्यो कि माँ धन मांग ले I बहू न पूछी तो बा बोली कि सासुजी पोतो मांगलो I बुढ़िया माई सोची कि ये तो दोनूं तो आपना मतलब की मांग है, सो पड़ोसन न जाकर पूछी I पड़ोसन न जाकर बोली कि गणेशजी म न कह है कि कुछ मांग ले, सो के मांगू I पड़ोसन बोली कि क्यूँ तो धन मांग, क्यूँ पोतो मांग है, थोड़ा दिन जीवगी सो दीदा – गोड़ मांग ले I घर आकर बुढ़िया माई सोची कि बेटा – बहू राजी होव जिकी भी मांगनी चाहिए I दूसरा दिन गणेशजी आया, बोल्या कि कुछ मांग I बुढ़िया माई बोली कि दीदा गोडा दे – सोना क कटोरा म पोता न दूध पीतां देखां – अमर सुहाग दे – निरोगी काया दे – भाई, भतीजा न, सारा परिवार सुख दे – मोक्ष दे I गणेशजी बोल्या कि बुढ़िया माई तू तो म न ठग लिया, सब कुछ मांग लिया I पर ठीक है, अइयां ही हो जासी I गणेशजी अंतरध्यान होगा I बुढ़िया माई क सब कुछ बैयाँ ही होगो I हे गणेशजी महाराज ! जिसो बुढ़िया माई न दियो बिसो सब न दियो I कहताँ न, सुनता न, हुंकार भरतां न, आपना सारा परिवार न दियो I