
माघ चौथ
Date: 22 January 2022
माघ बदी चौथ को, ” चौथ ” का व्रत करते हैं I इस दिन कहानी सुनते है I एक पाटा पर जल का लोटा, तिलकुट्टा (सफेद तिल में गुड़ या चीनी मिलाकर और कूटकर), चावल रखो । फिर लोटा पर सथिया करके और तेरह टिक्की रोली से दो । हाथ में तिलकुट्टा लेकर ” माघ चौथ की कहानी ” सुनो । कहानी नीचे लिखी है I फिर अपने टीका लगाकर, एक कटोरी में तिलकुट्टा और रुपिया रखकर, बाना निकालकर सासुजी को पैर छूकर दे दो । पाटा पर जो तिलकुट्टा रखा है और कहानी सुनते समय हाथ में जो तिलकुट्टा लिया था, उससे चाँद को अरग दो I रोली, चावल और गुड़ चढ़ाओ । फिर भोजन कर लो । खाने में तिलकुट्टा और मूली भी खाओ । अपनी बहन-बेटियों का भी बाना निकालकर तिलकुट्टा और रुपिया भेजो ।
माघ चौथ का उजमन
जब आपके लड़का होता है या फिर लड़की की शादी होती है तब “माघी चौथ” का उजमन करते हैं । इस दिन सवा सेर का तिलकुट्टा और बनाओ । इसकी तेरह कुड्डी करके उसके ऊपर एक साड़ी और रुपिया रखकर, कहानी सुनने के बाद हाथ फेर कर सासुजी को पैर छूकर दे दो । तिलकुट्टा का बाना बांट दो ।
माघ चौथ की कहानी
एक साहूकार-साहूकारनी थी । वा धर्म, पुण्य, व्रत कुछ भी कोणी करता, जिक स उना क कोई सन्तान कोनी होई । एक दिन पड़ोसन “माघी चौथ” की कहानी सुन रही थी, तो साहूकारनी पूछी कि ये के करो हो । वा बोली की आज चौथ को व्रत है, सो कहानी सुनु हूँ । साहूकारनी पूछी कि इससे के होव । पड़ोसन बोली कि अन्न, धन, संतान होव । जद साहूकारनी बोली कि म न्हाई रह जाऊँ, तो सवा सेर को तिलकुट्टो करूँ और चौथ को व्रत करूँ । वा न्हाई रहगी । पिछ साहूकारनी बोली कि मेर लड़को हो जाव, तो ढाई सेर को तिलकुट्टो करूँ । उक लड़को भी होगो । पिछ वा बोली कि हे चौथ माता ! मेरा बेटा को विवाह हो जाव, तो सवा मन को तिलकुट्टो करूँ । बेटा को विवाह मंडगो, बी लोग बरात ले कर गया । चौथ माता सोची कि या जब स न्हाई है, तब स तिलकुट्टा बोल है और अब तो बेटो भी ब्य्हान चली गई, तो भी एक भी तिलकुट्टो कोणी की, अगर आपा ई न चुटकुलो नही दिखावागा, तो आपा न कलियुग म म कोई कोणी मानसी । बठी न बेटो तीन फेरा तो ले लिया था, चौथा फेरा म चौथ माता गाजती-घोरती आई और बींद न उठा कर पीपल पर बैठा दियो । फेरा म सार हाहाकार माचगी । सार बींद न खोज लियो, कठ भी कोणी मिल्यो । भोत सारा दिन बाद गणगौर आई । छोरियां गणगौर पूजन क लिए गई । पीपल क पास दूबल्या न जाती । पीपल पर स बींद रोजीना एक छोरी न बोलतो । ‘आ ए मेरी अध्ब्याहेड़ी’ । या सुन सुन क छोरी सुकण पड़गी । छोरी की माँ बोली कि बेटी म तन चोखो खुवाऊं, फेर भी तू क्यूँ सुकण पड़गी । जद छोरी बोली की माँ, जब दूब ल्याण जाऊं, तो पीपल पर स एक जनों बींद का कपड़ा पहना, मेहँदी लगाया, सेहरो पहना रोजीना म न बोल कि ‘आ ए मेरी अध्ब्याहेड़ी’ । माँ बठ जा कर देख, ऊँ को जवाई ही बैठड़ो है । जना बा बोली कि मेरी बेटी न अध्ब्याही कर के थे अठ क्यूँ बैठ्या हो । बींद बोल्यो कि म तो चौथ माता क गैण पढयो हूँ । मेरी माँ तिलकुट्टो बोल्यो थी, जिको करयो कोनी, जिक स ‘चौथ माता’ म न नाराज होकर उठा ल्याई और अठ बैठा दियो । ऊँ बखत बा बींद की माँ क गई और सारी बात बताई । साहुकारनी बोली की हे चौथ माता ! मेरा बेटा आजा व, तो म ढाई मन को तिलकुट्टो करूँ । छोरी की माँ भी ढाई मन को तिलकुट्टो बोल दियो । चौथ माता, राजी होगी और ऊक बेटा न ल्याकर फेरा म बैठा दियो, बेटा को ब्याह होगो । पिछ ब लोग खूब धूम धाम स चौथ माता को तिलकुट्टो करयो और सारी नगरी म हेलो फिरायो कि सब कोई ‘चौथ माता’ को व्रत करियो, तिलकुट्टो करियो । हे चौथ माता ! ऊँ का बेटा-बहू मिलाया, जिस सबका मिलाइयो । कहतां न, सुणतां न, हुंकारा भरतां न, आपना सारा परिवार न मिलाइयो ।
इक बाद बिन्दयाकजी की कहानी कह ।
बिन्दायकजी की कहानी
दो देवरानी जेठानी थी । देवरानी क धन थो, जिठानी गरीब थी । जिठानी गणेश जी की भोत आराधना करया करती । वा आपनी देवरानी का चुन, पीस न जाती । जिक कपड़ स चुन छानती, वो आप क घरां ल्याती और आप क धणी न घोलकर प्या देती । एक दिन देवरानी का टाबर देख लिया और आपनी माँ न बोल्या की माँ ताई आपनो चुन को कपड़ो ले जाकर ताऊजी न घोल कर पिला देव । देवरानी बात सुनकर भोत रवीजी और जिठानी न बोली कि म्हार सजां व् चुन छान को कपड़ो धरक और हाथ धोकर जाया कर । वा बैंया ही करी, घरा गई , तो धणी बोल्यो कि चून घोल कर दे । जिठानी बोली की आज बा चून छान न कपड़ो राख लिया । जद ऊँको धणी गुस्सा म आकर ऊँन पाटा स मार न लाग्यो । वा गणेशजी-गणेशजी करती सोगी । गणेशजी आया और पूछयो कि क्यूँ सुती है । वा बोली कि मेरी देवरानी क स चून छानन को कपड़ो ल्याकर, मेर धणी न घोल कर पिलाती । आज वा कपड़ो राख लियो, म पिला न कोणी सकी, सो मेरो धणी म न मारयो । गणेशजी बोल्या कि म घर-घर स तिलकुट्टो खाकर आयो हूँ, निमटन की मन म है, सो कठ जाऊं । वा बोली कि महाराज ! घणी जगां पड़ी है चाहे जात नीमट लेवो । गणेशजी निमटकर बोल्या कि निमट तो लियो अब पूछूं कठ । जद वा गुस्सा म बोली की मेरे सिर क पूँछ ल्यो । गणेशजी सिर क पूँछ कर चला गया । थोड़ी देर म वा उठ कर देख तो सारो घर हीरा स जगमगा रह्यो है, सारो सिर भी जगमगाव है । धन बटोर न लागी तो देवरानी क जान म देर होगी । देवरानी टाबरां न भेजी कि देखकर आओ आज ताई आई क्यूँ कोनी । टाबर आकर देख्या और माँ न बोल्या कि ताई क तो भोत धन हो रह्यो है । देवरानी भागी-भागी आई और पूछी की तेर इतनी धन कैयां होगी । जिठानी सारा बात बता दी । इतनी सुन देवरानी घरां आई और आपक धनी न बोली कि म न पाटा ही पाटा स मारो, जेठानी को धनी ऊन मारयो तो ऊ क भोत धन होगो । धणी बोल्यो कितू धन की भूखी क्यूँ मार खाव है, पर वा मानी कोनी । धणी खूब मारयो । वा आपको सारो मकान खाली कर क गणेशजी को नाम लेकर सोगी । गणेशजी आया और बोल्या कि म कठ निमटूं । जद बा बोली कि महाराज, बिं क तो छोटा सो मकान थो, मेर तो घनो ई बड़ो मकान है, थारी इच्छा होव जात ही निमट ल्यो । गणेशजी सारा मकान म निमट लिया । फेर पूछ्या कि अब पूछूं कठ । जद बा बोली की आओ मेर सिर क पूछ्ल्यो । ऊँ क सिर क पूँछ कर गणेशजी अंतरध्यान होगा । थोड़ी देर म उठ कर देख, तो सार कूड़ो सड़ है । जना देवरानी बोली हे महाराज ! थे मेर स कपट करया । जेठानी न तो धन दियो, म न कूड़ो दियो । गणेशजी आया और बोल्या कि तू धन की भूखी मार खायी, वा धर्म की भूखी । देवरानी बोली कि थे थारो यो सब समेटो, म न तो धन कोणी चाहिए । गणेशजी बोल्या कि तेर धन म स आधो धन जिठानी न दे, तब समेटुंगा । देवरानी आधो धन देई । जद गणेशजी न आपनी माया समेटी । हे गणेशजी महाराज ! देवरानी न दियो जिसो कोई न मत दियो, जिठानी न दियो जिसो सब न दियो । कहतां न, सुणतां न, हुंकारा भरतां न, आपना सारा परिवार न मिलाइयो ।