नागपंचमी

Date: 28 July 2021

               श्रावण बदी पंचमी को ” नागपंचमी ” होती है । इस दिन ठंडी रसोई खाते हैं । एक पाटे पर जेवड़ी से सात गाँठ का सांप बना कर रखो । सांप को जल, कच्चा दूध, मोई (बाजरे के आटा में घी और चीनी मिला कर), भिगोया हुआ मोठ-बाजरा, रोली, चावल, ठंडी रोटी और दक्षिणा चढ़ाओ । फिर नागपंचमी की कहानी सुनो । मोठ-बाजरा और रुपिया पर बाना निकालकर सासुजी को पैर छूकर दे दो । अपनी बहन-बेटियों का भी बाना निकाल कर भेजो । इस दिन अपनी बहन-बेटियों को पीहर जरूर बुलाना चाहिए ।

नागपंचमी की कहानी

एक साहूकार था । ऊ क सात बेटा और सात बहू थी । सातो बहुवां खंदे माटी ल्यान गई । माटी म स एक सांप निकल्यो । जद सारी दोर-जिठानियाँ सांप न मारन लागी तो छोटी बहू मारन कोणी दियो । वा सांप को आपको धरम को भाई बना लियो और बोली की मेर पीरम बाप, बाम्बी म सांप । जाना सारी डोर-जिठानियाँ बोली कि काल इको छाणा ल्यान को भाई बना लियो और बोली की मेर पीरम बाप, बाम्बी म सांप । जाना सारी डोर-जिठानियाँ बोली की काल इको छाणा ल्यान को ओसरो ह सो उठइ न ही भेजांगा, वा सांप निकलगा और ई न डस लेसी । दूसर दिन वा छाणा ल्यान गई तो वा सांप बैठ्यो थो, उन देख कर फुफकार मारी । जद वा बोली भाईजी राम राम । तो सांप बोल्यो की तू मन भाई बोल्दी नही तो म डस लेतो । जद वा बोली की थे तो मेरा धरम का भाई हो, थे म न कैयां डस लेता और बोली की जीवो नाग नगोलिया, जीवो बासुकी नाग, जिव मेरो लाड़ लड़ाइयो, नेवर घाली पाँव । जद सांप ऊ न नेवर देई । बा नेवर पैर घरां आई जद दोर-जिठानियाँ बोली नि इन तो सांप देवता भी डस्यो कोणी । थोड़ी देर बाद सांप उन लेन आगो और बोल्यो कि मेरी बहन न भेजो । जद दोर-जिठानियाँ बोली कि आपन तो पीहर तो भी अपना भाई लेन कोनी आया, इक पीहर कोणी तो भी इके धरम नो भाई लेन आगां । पिछ उन बटेड़ी, सिर-मेहँदी कर क भेज दी । दोनू जना आ गया, रास्ता म उना न खून की नदी बहती मिली । जद वा बोली कि म कैयां पार जाऊँगी । जद भाई बोल्यो कि मेरी पूँछ पकड़ ले । जैया ही व् जान लग्या बैयाँ ही खून की नदी दूध की होगी । पीहर आता ही सब कोई ऊका लाड़-चाव कर लग्या । भोत दिन रहता होगा तब एक दिन सांप की माँ बोली कि म तो बार न जाऊं हूँ तू तेर भांया न दूध ठंडो कर क प्या दिये । बा भांया न तातो-तातो दूध प्या दियो सो कोई का तो फान जलगा कोई की पूँछ जलगी । एक दिन बा आपकी पड़ोसन स लड़ाई कर थी जद कोई बात पर बोली कि मेरखाड़ियाँ-बाड़िया भांया की सौगंध । भाई सुन लिया और आपकी माँ न बोल्या कि भोत सारा दिन होगा अब बहन न सासर भेज दे । जणा बिन सब कोई भोत सारो धन दे कर भेजन लग्या तो ताई-चची बोली कि बाई तेरो लाड तो भोत ही कार्यो पण त न छ कोठां की ताली तो देदी, सातवाँ की ताली कोणी देई । जद बा सांप न कयो कि म न सातवाँ कोठ की ताली क्यूँ कोणी देई । तो बो बोल्यो कि सातवाँ कोठ की टाली लेवगी तो पछ्तावगी, पर बा जिद कर क ताली लेली । कोठो खोल कर देख तो एक बुड्डो अजगर बैठ्यो थो और बि न देखता ही फुफकार मारी । जद वा बोली बाबूजी राम-राम । तब अजगर बोल्यो कि तू म न बाबूजी कह दियो नही तो म तन डस लेता । वा बोली कि थे तो मेरा धरम का पिता हो म न कैयां डस ले तो और बोली कि जीवो नाग नगोलिया, जीवो बासुकी नाग, जिव मेरी लाड लडाइयो, नो करोड़ को हार । जद नाग देवता न हार काढ़कर दे दियो । वा भोत धन-दौलत ले कर सासर आगी । वाकी सारी दोर-जिठानियाँ कयो कि आप न तो पीहर है तो भी बाप-भाई आपां न धन कोणी दियो, इक पीर कोणी तो भी या भोत सारो धन लेकर आई है । दूसर दिन बिका टाबर अनाज का बोरा खिन्डाव था तो उना की ताई-चाचियाँ बोल मारयो कि तेरा नाना-मामा तो अजरागिया-बजरागिया है, ऊल कूल सुनता होसी सो चाँदी की अनाज की बोरियाँ मंगा देसी, थे म्हारो अनाज मत खिंडावो । या बात छोरा-छोरी आपकी माँ न जा क बोल्या तो सांप उनाकी बात सुनली और आपकी माँ स मांगकर सोना-चाँदी की अनाज की बोरी मंगा कर बाई रखा दी । दूसर दिन टाबर उना की झाडू खिन्डाव था, तो ताई-चाचियाँ ओरूं बोल मारी, तो सांप ऊनान सोना-चाँदी की झाड़ू करवा क मंगा दी । जद दोर-जिठानियाँ बोली कि इनान तो बोल मत मारो, बोला म भी धन स घर भर लाग्यो । आपा राजा न जाकर लगा देवां । जना वा राजा न जाकर कयो कि मेरी दोरानी क नो करोड़ को हार है, वो बिक के सोव, वो तो थारी रानी क सोवगो । जद राजा साहूकार क बेटा की बहू न बुलायो और बोल्यो कि वो हार मेरी रानी न दे दे । बा हार काढ़ कर रानी न दे दियो और मन ही मन म बोली ‘मेर गला म रव तो हार, रानी क गला म नाग हो जाइयो’ । वा हार देकर जान लागी । बठी न रानी गला म हार पहनता ही हार सांप होकर काटन लग्यो तो रानी चिल्लाई कि साहूकार क बेटे की बहू न बुलाओ जिको मेर गला म स सांप निकाल, वा के जादू टोना करगी । राजा उन बुलायो और बोल्यो कि तू मेरी रानी क के कर दियो, गला म सांप ही सांप होगा सो जल्दी पाछा निकाल । वा बोली कि म तो कुछ भी कोणी करयो, मेर तो पीहर कोणी थो सो सांप देवता न मेरा भाई-भतीजा बनाया था, बी ही मन यो हार दियो थो । जद राजा बिन हार पाछो दे दिया, एक हार आपक म स और दे दियो । दोर-जिठानियाँ फेर बात करन लागी कि अब के करा या तो राजा-रानी स भी कोनी डरी । पिछ ब ऊक धनी न लगा दियो कि तेरी लुगाई तो जाव सेठ स ही धन लियाव, तू ऊँ न लड़ कोनी । बो आपकी लुगाई न जाकर भोत लड़न लग्यो, बोली है सो ही बात बता, इतनो धन कठ स ल्याई । जद वा बोली कि म्हें सातू दोर-जिठानियाँ खांदेडा माटी ल्यान गई थी । ब ठ सांप देवता निकल्यो जना सब कोई मारन लग्या, म मार न कोनी देई । मेर पीहर कोनी थो सो म सांप न मेरो भाई बना लियो, ब ही मन सब धन दियो है । पिछ ऊँको धनी सार गाँव म हेलो फेरा दियो- नाग पंचमी न सब कोई ठंडी रोटी खायो, कहानी सुनियो, बाना निकालियो और नाग देवता की पूजा करियो । हे नाग देवता ! जिसे बिन पीहर दिखायो बिसो सब न दिखाइयो । कहतां न, सुणतां न, हुंकारा भरतां न, आपना सारा परिवार न दिखाइयो । इसके बाद बिन्दायकजी की कहानी सुननी चाहिए I

बिन्दायकजी की कहानी

एक मीन्डको और एक मीन्डकी थी । मीन्डकी रोजीना बिन्दायाकजी की कहानी कहती । एक दिन मीन्डको बोल्यो कि तू रोज पराया पुरुष को नाम लेव है । अगर अब लेवगी तो मोगरी स सर फोड़ दूंगा । बिन्दायाकजी गुस्सा होगा । राजा की बांदी आई, दोनूआं न पात म घाल कर लेगी और चुल्हा पर चढ़ा दियो । दोनूं जना सीज न लाग्या तो मीन्डको बोल्यो मीन्डकी भोत कष्ट आयो तेर बिन्दायाकजी न सुमर नहीं तो आपां दोनू मर जावांगा । मीन्डकी सात दफा संकट बिन्दायक संकट बिन्दायक कयो । दो सांड लड़ता आया, पात क सींग की मारी, पातो फूटगो, मीन्डको और मीन्डकी सरोवर की पाल म चल्या गया I हे बिन्दायकजी महारज ! जैसा मीन्डको – मीन्डकी को कष्ट काट्यो, बैयाँ ही सबको काटियो । कहतां न, सुणतां न, हुंकारा भरतां न, आपना सारा परिवार को काटियो ।