प्रदोष बुधवार कथा
१) इस व्रत में, दिन में केवल एक बार भोजन करना चाहिए I
२) इसमें हरी वस्तुओं का प्रयोग किया जाना जरुरी है I
३) यह व्रत शंकर भगवान का व्रत है I शंकरजी की पूजा धुप, बेलपत्र आदि से की जाती है I
प्राचीन काल की कथा है – एक पुरूष का नया – नया विवाह हुआ था I वह गौने के बाद दूसरी बार पत्नी को लिवाने अपने ससुराल पहुँचा और अपनी सास से कहा कि बुधवार के दिन ही अपनी पत्नी को लेकर नगर जाएगा I उस पुरुष के सास – ससुर ने, साले – सालियों ने उसको बहुत समझाया कि बुधवार को पत्नी विदा कराकर ले जाना शुभ नहीं है I लेकिन वह पुरुष अपनी जिद्द से टस से मास नहीं हुआ I विवश होकर सास – ससुर को अपने दामाद और पुत्री को विदा करना पड़ा I पति – पत्नी बैलगाड़ी में चले जा रहे थे I एक नगर के बाहर निकलते ही पत्नी को प्यास लगी I पति लोटा लेकर पत्नी के लिए पानी लेने गया I पानी लेकर जब लौटा तो उसके क्रोध और आश्चर्य की सीमा न रही, क्योंकि उसकी पत्नी किसी अन्य पुरुष के लाये लोटे में से पानी पीकर हँस – हँसकर बतला रही थी I क्रोध में आग – बबूला होकर वह उस आदमी से झगड़ा करने लगा I मगर यह देखकर उसकी आश्चर्य की सीमा ना रही कि उस पुरुष की शक्ल उस आदमी से हुबहू मिलती थी I
हमशक्ल आदमियों को झगड़ते हुए जब काफी देर हो गयी तो वहां आने – जाने वालों की भीड़ एकत्रित हो गयी I सिपाही भी आ गया I सिपाही ने स्त्री से पूछा कि इन दोनों में से कौन सा आदमी तेरा पति है, तो वो बेचारी असमंजस में पड़ गयी, क्यूँकी दोनों की शक्ल एक दूसरे से बिलकुल मिलती थी I बीच राह में अपनी पत्नी को इस तरह लुटा देखकर उस पुरुष की आँख भर आई I वह शंकर भगवान से प्रार्थना करने लगा, कि हे भगवान ! आप मेरी और मेरी पत्नी की रक्षा करो I मुझसे बड़ी भूल हुई जो मैं बुधवार को पत्नी को विदा करा लाया I भविष्य में ऐसा अपराध कदापि नहीं करूंगा I उसकी यह प्रार्थना जैसे ही पूरी हुई दूसरा आदमी अंतरध्यान हो गया और वह पुरुष सकुशल अपनी पत्नी के साथ अपने घर पहुँच गया I उस दिन के बाद पति – पत्नी नियमपूर्वक बुधवार प्रदोष व्रत रखने लगे I