सूरज रोटा

गनगोर पूजने वाली लड़कियाँ रविवार को “सूरज रोटा” का व्रत करती हैं I एक पाटा पर जल भरा हुआ लोटा में रोली से साथिया कर के रखो I एक कलसा में जल रसोई बनाने के लिए पाटा के बगल में ओ I कच्चा सूत का आठ तार का, आठ गाँठ का डोरा और आठ गेहूं का दाना हाथ में लेकर कहानी सुनो I फिर कलसा के जल से बिना नमक की रसोई बनाओ और एक छेद की और एक बिना छेद की रोटी बनाओ I छेद वाली रोटी में से सूरज भगवान को देखते हुए, डोरा और गेहूं का दाना हाथ में लेकर, कहानी सुने हुए जल से अरग दो I दूसरी लड़की जल छोड़ती जाती है और पूछती जाती है “सूरज – सूरज दिख्यो” I बाई कहती है “दिख्यो सो ही टूट्यो” I ऐसे ही सात बार करो I फिर एक बार बिना नमक की रासोई खाओ I कलसा का ही पानी पियो I सूरज ढलने के बाद पानी भी नहीं पियो I अगर लड़की की ब्यावली साल है तो, उजमन करो I और सब कुछ ऐसे ही करो I सिर्फ आठ जगह चार – चार सीरा – पूड़ी , ओढ़ना साड़ी और रुपिया पर बाना निकालकर सासुजी को पैर छूकर दे दो और आठ व्रत करो I लड़कियों को जिमाओ I ब्राह्मण की लड़की हो तो दक्षिणा भी दो I

सूरज रोटा की कहानी

 दो माँ बेटी थी I वो सूरज भगवान का व्रत करती थी I एक दिन माँ बेटी न बोली कि मैं बाहर जा रही हूँ, तू दो रोटी पो लिए I वो  रोटी बना ली I एक जोगी भिक्षा मांगन आयो, तो बेटी न माँ क रोटा म स टुकड़ो तोड़ कर जोगी न घाल दियो I माँ बारन स आई बोली कि मेरी रोटी दे दे I बेटी बोली की एक जोगी भिक्षा मांगन  थो, सो म ई म स थोड़ो टुकड़ो ऊँ न घाल दियो I या सुनता ही माँ बेटी क गल पड़गी और सारा दिन कहव लागी – “घी रोटी दे,रोट भां की होर दे, वो ही सागी रोटी दे” I और    बावली होगी I जना सब कोई बीन अँधेरी कोठरी म बंद कर दिया I बेटी क पीहर म और कोई कोनी थी, जद बा सूरज भगवान न बोली कि थे मन पीर बासो दिखावो I सूरज भगवान कयो कि ठीक है, म तन सवा पहर को पीर दिखाऊंगा I पीछ जंगल म शहर बसगो और माँ – बाप, भाई – भतीजा, धन – दौलत सब होगा I सवा पहर की होन लागी, तो बेटी बोली कि मेरी तो अभी मन कोणी भर्यो I सूरज भगवान बोल्या कि अब तो अठ स चालनो ही पड़सी I पीछ बी लोग ऊठ स चाल्या, थोड़ी दूर गया होगा बेटी बोली म तो मेरी जूती भूल आई सो लाऊँगी I सूरज भगवान बोल्या कि अब तो बठ कुछ भी कोनी I पर वा मानी कोनी, जाकर देख तो और तो कुछ भी कोनी खाली गाछ क निच जूती पड़ी है I पिछ बा बठ स जूती लेकर चालन लागी, तो भगवान न बोली कि थे म न और तो सब कुछ दे दिया, मेरी बुड्डी माँ बावली होयेड़ी है, ऊन और ठीक कर दो I भगवान उकी माँ न ठीक कर दिया और भाई – भतीजा, धन – दौलत भी भोत दिया I हे सूरज भगवान ! जिसो बिन दियो, जिसो सब न दियो I कहता न, सुनता न, आपना सारा परिवार न दियो I ईक बाद बिन्दायकजी की कहानी सुनो I

बिन्दायकजी की कहानी

एक दिन बिन्दायकजी को मेलो लाग रयो थो I सब कोई मेला म जाव था I एक छोटी सी छोरी थी, जिकी आपनी माँ स बोली कि म भी जाऊंगी I माँ बोली कि ऊठ भोत भीड़ है, जिको कठ दब – चिथ जावगी I पर छोरी जिद कर लियो कि म तो जाऊंगी I जना माँ ऊँ न दो चूरमा का लाडू और घंटी म जल दिया और बोली कि एक लाडू तो गणेशजी न खिला कर पानी पिला दिए, दूसरो तू खाकर पानी पी लिए I छोरी मेला म चली गयी I सब कोई मेला देखकर पाछ आन लाग्या, तो छोरी न बोल्या कि घरां चाल I छोरी बोली कि म तो गणेशजी न लाडू खिलाय बिना कोनी जाऊं और गणेशजी क आग बैठगी और कहती गयी – “एक लाडू तुझको एक लाडू मुझको” I अईयाँ ही साड़ी रात बीत गयी I गणेशजी सोच्या कि अगर लाडू नहीं खाऊंगा तो या घरां कोनी जावगी, सो छोटो सो रूप धर कर आया और छोरी स लाडू लेकर खा लिया और पानी भी पी लिया I फिर बोल्या कि तू कुछ मांग I छोरी बोली कि मन तो मांगनी कोनी आव I बिन्दायकजी बोल्या आव सो ही मांग ले I छोरी बोली – “अन्न मांगू, धन मांगू, लक्ष्मी मांगू, नौ खंड महल, चौरासी दिया, हाथी हँ स, बांदी पीस, खूँटी हार, सेज भरतार, रुनझुन बैल इतनो मांगू हूँ I बिन्दायकजी बोल्या कि छोरी छोटी सी दिख थी, भोत मांग लियो I पर जा तेरो इतनो ही हो जासी I छोरी न सब कुछ मिलगो I रुनझुन बैल म बैठ कर, सारो सामान और् सब न लेकर आप क घरां गयी I माँ बोली कि सब तोमे लम स आगा, तू इतनी देर से के कर रही थी I छोरी बोली कि सब तो मेलो देखकर आगा, म तो बिन्दायकजी न चूरमो खिलाकर जल प्या कर आई हूँ I बिन्दायकजी मेर पर राजी हो गया और म न इतनो धन, सब चीजां दिया है I ऊँ की माँ और दुनिया देखती रहगी I सब कोई बिन्दायकजी भोत मानता कर न लाग्या I हे बिन्दायकजी महाराज ! जिसो बी छोरी न दियो, बिसो सब न  दियो I कहता न, सुनता न, आपना सारा परिवार न दियो I